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रेड लाइट पर वो बूढी औरत

रोज ऑफिस से आता हूँ घर को।  रोज NTPC  के  रेड लाइट पर वो बूढी औरत दिखती है। हर गाड़ी के आगे हाथ जोड़कर मांगते  हुए। टूटे काले फ्रेम के अन्दर धंसी हुई आँखें ,मटमैली साड़ी जो शायद कभी सफ़ेद रही होगी , कंधे पर पुराना सा झोला,झुकी हुई देह को लाठी से  टेके।  कभी कभी मेरे ऑटो के सामने भी आती है , हाथ जोड़े हुए।  कभी कभी कुछ देने का सोचता हूँ, लेकिन .कुछ कल्पित सवालों में उलझ जाता हूँ। बुढिया क्या सोचती होगी मांगते हुए ? कोई कुछ दे दे तो ?? कोई कुछ भी ना दे तो   ? कहा  रहती होगी ? उसके पति और  बच्चे ? कब से मांगती होगी ?  कब तक ऐसे मांगती रहेगी ? उम्र भी तो आखिरी पड़ाव में ही है।  फिर कुछ और उलझे सवाल जैसे यही बुढिया  क्यों  ? सामाजिक असमानता इत्यादि, इत्यादि।  फिर से गाड़ियों के कान फोडू  होर्न  से विचारों की श्रृंखला टूटती है। बुढिया  मांगते मांगते दूर निकल गयी है। सामने लाल बत्ती भी अपना रंग बदल चुकी है।   मेरे विचारों ने भी रंग बदल लिया है।  कल फिर से ऑफ...

वक्ता

हाथ छूट रहे थे।  आखिरी ही मुलाकात थी, शायद। हमेशा की तरह कुछ कहना चाहता था , मगर कह नहीं पाया। . . . सुना है आजकल अच्छे  वक्ताओं में गिनती होती है उसकी।