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संदेश

बुजुर्ग कदम - युवा मन

सालों बाद मिले थे देवकुमार और मीनल । विदेश में दशकों रहने के बाद जब मीनल वापस अपने शहर आयी तो अचानक देव से मुलाकात हो गयी । वही देव जो उसके प्रेम का देव था कभी, किन्तु दोनों के माँ बाप ने उन्हें मिलने ना दिया था । आज भी वो देव को नहीं पहचान पाती लेकिन मीनल की आँखें तो देव कभी भूला ही नहीं था । देखते ही पहचान गया । कुछ देर हाल चाल  होने के बाद; "चलो अपने पुराने अड्डे पर चलते हैं। जानती हो वहां एक कॉफी शॉप खुल गया है। " "अरे पर बच्चे घर में इंतजार कर रहे होंगे। " "अरे छोडो भी बच्चे भी तो अब बड़े हो गए हैं। अच्छा चलो फ़ोन कर लो। " "मुद्दत बाद मिले हो लेकिन बदले बिलकुल नहीं। पर थोड़े बुड्ढ़े हो गए हो। " "और तुम ?" "मैं तो अभी भी वैसी ही हूँ, स्वीट सिक्सटीन। हाहाहाहा। " "अरे ! धीरे बोलो कोई सुनेगा तो क्या कहेगा बुड्ढे बुड्ढी पागल हो गए हैं। अच्छा तुम्हारा परमेश्वर कैसा है ?" "कौन परमेश्वर ?" "अरे पति परमेश्वर " "हाहाहा ! तुम भी न पोते पोती हो गये पर सुधरे नहीं हो " "याद है आखिरी...
हाल की पोस्ट

Holy Cow

गोदान संपन्न हो चुका था। महापात्र दान में मिली गाय को लेकर यजमान के घर से थोड़ी दूर आ गए थे। वही पर उन्होंने उस्मान को बुलाया था। दान में मिली गाय को सही दाम में बेचकर महापात्र स्वस्थान लौट गए। उधर उस्मान भी गाय को लेकर अपने घर लौट गया था। कुछ दिन बाद बीफ के लिए हुए विवाद में कई गाँव सम्प्रदयायिक दंगे की चपेट में था। केशरिया झंडे के साथ महापात्र का बेटा और हरे झंडे के साथ उस्मान का बेटा भी दंगाईयों में शामिल था।

ओस की बूंदें

सुखिया आज सो नहीं पा रहा था। खेत मे फसल पड़ी थी और आसमान में बेमौसम मेघ ने डेरा जमा लिया था। दिन भर की मेहनत से शरीर थक के चूर हो गया था। पलकों पर नींद का बोझ उठाये अँधेरे में बार बार आसमान की ओर देख रहा था। मानो एक फ़रियाद कर रहा हो मेघ से। लेकिन तभी बिजली कड़की जोर से। और लगा मानो आसमान के साथ साथ किसानों का भी सीना फट गया हो। उसे लगा कि बाहर का अँधेरा बिलकुल उसके जीवन के अँधेरे की तरह है। फिर जाने कब आँख लग गयी। नींद में सुखिया ने एक भयानक सपना देखा। वो फसल को काट रहा है औ र लेकिन हर पौधे से खून टपक रहा है। गाढ़ा लाल खून। उसने जल्दी जल्दी और फसल को काटना शुरू किया। चारो तरफ खून ही खून। एक सैलाब सा मानो। सुखिया उस खून के दल दल में डूबने लगा। अचानक उसकी आँख खुली। वो पसीने से लथपथ था। बाहर देखा तो सुबह हो चुकी थी। आसमान साफ़ था। भागा खेत की तरफ। दूर से नजर आया गेंहू के पौधे पर ओस की बूंदें चमक रही थी। सुखिया ने ऊपर देखा आसमान की तरफ। मानो शुक्रिया कह रहा हो।

Smoking Kills wali Laghukatha

लड़के ने जेब टटोली । माइल्ड्स की डब्बी खाली थी । उसे याद आया बीड़ी का एक बंडल पड़ा है पुराने जिंस की जेब में । भाग के बीड़ी ले आया । लड़की अभी भी बालकनी में खड़ी आसमान में तारों को निहार रही थी । लड़के ने बीड़ी सुलगा के धुँआ उसकी तरफ छोड़ा । लड़की सिगरेट नहीं पीती थी लेकिन उसके वोडका का नशा पेसिव स्मोकिंग से बढ़ सा गया । लड़की ने लड़के को पकड़ के चूम लिया । हाथ का बीड़ी बुझ गया था । आगे की कहानी में आग थी लेकिन तम्बाकू का धुँआ नहीं था । लड़का अब लड़की के साथ नहीं है । लड़का घुम्रपान छोड़ चुका है लेकिन लड़की के नाक में जब भी सिगरेट का धुँआ आता है उस कमबख्त की याद आ ही जाती है !!!! # SmokingKillswaliLaghukatha

सामंजस्य

"सपना कहाँ अटकी है तू भी... पुरानी परम्परा और रीति-रिवाजों में। अरे इतनी बड़ी वैज्ञानिक है, खुद की एक पहचान है, नाम है। फिर भी ऐसा लगता है मानो तुम्हारे एक पैर में रूढ़िवादिता की बेड़ी जकड़ी है।" "नीलम, जानती हो बड़ा आसान है मेरी लिए इन रीति रिवाजो और अवैज्ञानिक रूढिवातीता को तोड़ देना। लेकिन मेरी माँ या बाबूजी की सोच तो अलग है ना। और उनकी ख़ुशी के लिए ये बेड़ी मैं कभी तोड़ ही नहीं सकती। बेशक मेरी उड़ान के लिए मुझे दोहरी मेहनत करनी पड़े।" "तो क्या तुम उनकी ख़ुशी के लिए अपनी ख़ुशी का गाला घोंट...." "कैसी बात कर रही है नीलम। अरे उनकी ख़ुशी में भी तो मेरी ख़ुशी ही है और आजादी की ये उड़ान तो माता-पिता ने ही सिखाया है तो उनके लिए कभी कभी ये परम्परा की बेड़ी मैं न पहन सकती क्या ?" नीलम ने आसमान में देखा कुछ चिड़िया झुंड में उड़ रहे थे। उस झुंड की एक चिड़िया जो ऊँची उड़ान ले सकती थी शायद लेकिन झुण्ड के साथ ही सामंजस्य बिठा रही थी। चिड़ियों की चहचहाहट के बीच नीलम उस चिड़ियाँ की आवाज सुनने की कोशिश करने लगी। वो उस स्वरबद्ध गान में पिसते अरमान को ढूँढ रही थी शायद। लेकिन...

माँ की आँखें तेरा रस्ता निहारे

पत्र पूरा होने से पहले मेरे शब्दों ने मेरा हाथ जकड़ लिया। पेन हाथ से छिटक कर दूर जा लुढ़का। लगभग गिरगिराते हुए मेरे भावुक मन ने मेरे ही रचित शब्दों से पूछा :  "कितने निष्ठुर हो तुम, मैंने तुम्हे रचा, एक बच्चे की तरह स्नेह दिया। और तुम मुझे रोक रहे हो। सम्मान नहीं तो कम से कम मेरे फैसले का अपमान तो ना करो।"  शब्द ने कुछ कहा नहीं लेकिन उन्ही शब्दों में से कुछ उभर के आया जो मेरी आँखों में चमक उठा: " माँ की आँखें तेरा रस्ता निहारे.... " फिर उन्ही शब्दों ने भावनाओं का बवंडर सा बना दिया, जिस मे मेरी आत्महत्या का फैसला बह चुका था।

इमोजी

सिमी वाश बेसिन के सामन लगे आदमकद आइने में मुँह धोने के बाद बड़े गौर से खुद को देख रही थी। दिन भर की भागदौड़ के बाद, शोर शराबे से दूर, शांत भाव से खुद को देखते हुए अप्रतिम आंनंद मिल रहा था उसे । उसे याद आया- "तुम्हारी आँखें कितनी गहरी हैं" यही कहा था हर्ष ने आज । फिर वो शरमा सी गयी। हाँ ऐसे ही तो ब्लश कर रही थी वो । शीशे में देखते हुए सोचने लगी । फिर जाने कहा से वो खडूस बॉस आ गया था । क्या कहा था उसने । हाँ यही कि योर परफारमेंस इज सो पुअर दैट....। कुत्ता साला । सीमी ने शीशे में देखा उसके चेहरे का भाव बदल गया था । उतेजना और क्रोध के मिश्रित भाव ने उसके चेहरे की आकृति बदल दी थी । अचानक खुद को देखते देखते उसे ये सोच हँसी आने लगी कि कितनी अजीबोगरीब लगती है वो गुस्से में । हँसते हँसते उसे अपना चेहरा और प्यारा लगने लगा । सिमी को हँसते हँसते कुछ और याद आने लगा । मैट्रो से आते समय फब्तियाँ कसते चेहरे । अब उसके चेहरे पर घृणा और क्रोध के मिश्रित भाव ने अपना रंग चढ़ा दिया था । उसने चेहरे पर एक बार फिर से पानी मारा । मुंह तौलिये से पोछते हुए उसने देखा कि अब चेहरा सपाट था । उसे लगा मानो सार...

इन्हे अत्याचार करने का बहुत अनुभव है

जाने माने प्रोफेसर मुकुंद जी मुस्कुराते हुए अपनी छात्रा की बात सुन रहे थे : "सर आप तो बिलकुल छा गए हैं। क्या जबरदस्त तथ्यपरक निबंध लिखा था आपने नारी शशक्तिकरण पर। आपकी लघुकथाएं भी जब्बरदस्त होती है जब आप नारी के शोषण और उनपर हो रहे अत्याचार को केंद्रित करते हुए लिखते हो। मैं तो फैन हो गयी हूँ आपकी। आखिर आप इतना मार्मिक कैसे लिख लेते हैं??" "इन्हे अत्याचार करने का बहुत अनुभव है.... " टेबल पर चाय रखते हुए उनकी श्रीमती जी ने बुदबुदाया। जो शायद इतनी धीमी थी कि कोई सुन नहीं पाया।