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माँ की आँखें तेरा रस्ता निहारे

पत्र पूरा होने से पहले मेरे शब्दों ने मेरा हाथ जकड़ लिया। पेन हाथ से छिटक कर दूर जा लुढ़का। लगभग गिरगिराते हुए मेरे भावुक मन ने मेरे ही रचित शब्दों से पूछा :  "कितने निष्ठुर हो तुम, मैंने तुम्हे रचा, एक बच्चे की तरह स्नेह दिया। और तुम मुझे रोक रहे हो। सम्मान नहीं तो कम से कम मेरे फैसले का अपमान तो ना करो।"  शब्द ने कुछ कहा नहीं लेकिन उन्ही शब्दों में से कुछ उभर के आया जो मेरी आँखों में चमक उठा: " माँ की आँखें तेरा रस्ता निहारे.... " फिर उन्ही शब्दों ने भावनाओं का बवंडर सा बना दिया, जिस मे मेरी आत्महत्या का फैसला बह चुका था।

इमोजी

सिमी वाश बेसिन के सामन लगे आदमकद आइने में मुँह धोने के बाद बड़े गौर से खुद को देख रही थी। दिन भर की भागदौड़ के बाद, शोर शराबे से दूर, शांत भाव से खुद को देखते हुए अप्रतिम आंनंद मिल रहा था उसे । उसे याद आया- "तुम्हारी आँखें कितनी गहरी हैं" यही कहा था हर्ष ने आज । फिर वो शरमा सी गयी। हाँ ऐसे ही तो ब्लश कर रही थी वो । शीशे में देखते हुए सोचने लगी । फिर जाने कहा से वो खडूस बॉस आ गया था । क्या कहा था उसने । हाँ यही कि योर परफारमेंस इज सो पुअर दैट....। कुत्ता साला । सीमी ने शीशे में देखा उसके चेहरे का भाव बदल गया था । उतेजना और क्रोध के मिश्रित भाव ने उसके चेहरे की आकृति बदल दी थी । अचानक खुद को देखते देखते उसे ये सोच हँसी आने लगी कि कितनी अजीबोगरीब लगती है वो गुस्से में । हँसते हँसते उसे अपना चेहरा और प्यारा लगने लगा । सिमी को हँसते हँसते कुछ और याद आने लगा । मैट्रो से आते समय फब्तियाँ कसते चेहरे । अब उसके चेहरे पर घृणा और क्रोध के मिश्रित भाव ने अपना रंग चढ़ा दिया था । उसने चेहरे पर एक बार फिर से पानी मारा । मुंह तौलिये से पोछते हुए उसने देखा कि अब चेहरा सपाट था । उसे लगा मानो सार...

इन्हे अत्याचार करने का बहुत अनुभव है

जाने माने प्रोफेसर मुकुंद जी मुस्कुराते हुए अपनी छात्रा की बात सुन रहे थे : "सर आप तो बिलकुल छा गए हैं। क्या जबरदस्त तथ्यपरक निबंध लिखा था आपने नारी शशक्तिकरण पर। आपकी लघुकथाएं भी जब्बरदस्त होती है जब आप नारी के शोषण और उनपर हो रहे अत्याचार को केंद्रित करते हुए लिखते हो। मैं तो फैन हो गयी हूँ आपकी। आखिर आप इतना मार्मिक कैसे लिख लेते हैं??" "इन्हे अत्याचार करने का बहुत अनुभव है.... " टेबल पर चाय रखते हुए उनकी श्रीमती जी ने बुदबुदाया। जो शायद इतनी धीमी थी कि कोई सुन नहीं पाया।

"खुरदरे हाथ"

"पिताजी ने बहुत किया है हम बच्चों के लिये। गरीबी में भी पढ़ा लिखा के दोनों भाइयों को ऑफिसर बना दिया। अब पिताजी को देख के कोई कह नहीं सकता कि एक समय वो खादान में मजदूरी करते थे ।" भावुक हो रहे पतिदेव को पत्नी ने टोका : "बट यू नो डार्लिंग, बुरा मत मानना लेकिना पापा को बोलो कि पार्टी में हाथ ना मिलाया करे लोगों से। कितने घिनौने खुरदरे से हाथ हैं। " पति चुप रह गया। जानता था बड़े घर की नखरैल घमंडी बीबी को समझाने जायेगा तो झगड़ा ही होगा । लेकिन दबी जुबान में बोल गया : "डियर तुम नहीं समझोगी । बच्चों कें हाथ हमेशा कोमल और सुंदर रहे इसलिये ही तो पिताजी के हाथ खुरदरे रह गये ।"

वोडका विथ गुआवा जूस

"ये आखिरी पैग है हम दोनों का साथ साथ। अब तो मिलना भी शायद मुश्किल ही होगा।" "सुनो केवल जूस ही डालो पैग में। आइंदा अब मैं गुआवा जूस के साथ वोडका नहीं लूँगी।" "हाहा..अच्छा और अगर पति ने कहा तो भी नहीं ??" "तो भी नहीं । गुआवा जूस तो वोडका से तभी मिलेगा जब हम तुम मिलेंगे ।"

लेकिन थूक के छींटें लौट के आ रही कुछ अपने ही चेहरे पर

जेठ की जलती दुपहरी में, पसीने से लथपथ रिक्शा वाला रेड लाइट के सामने खड़ा है। रेड लाइट के ग्रीन होते ही जैसे वो आगे को निकलता है एक SUV वाला रेड लाइट तोड़ के भागने के चक्कर में उसे ठोक देता है। रिक्शा का पहिया आगे से मुड़ जाता है। रिक्शा वाला गिर जाता है। SUV वाला एक 20 - 22 साल का लड़का निकालता है सर, सीसे से बाहर। एक मोटी सी गाली देता है और आगे निकल जाता है। रिक्शा वाला न तो उसकी गाडी की तरफ देखता है और ना ही उसे गाली सुनाई दे रही है। वो बस बैचैन सा कभी रिक्शा को द ेख रहा है तो कभी अपने पैर से निकल रहे खून को। कुछ बुदबुदा भी रहा है क्रोध में। लेकिन उतना स्पष्ट नहीं जितना SUV वाले की गाली स्पष्ट थी। मैं क्रासिंग पर सड़क पार करने के इंतजार में खड़ा देख रहा हूँ। एक 20-22 साल का निकम्मा, गैर जिम्मेदार लड़का कैसे 45-50 साल के एक वयस्क कर्मठ और जिम्मेदार नागरिक को कुचल के निकल जाता है। अक्सर इस तरह की चीजें दिख जाती है। बड़ा गुस्सा आता है पूंजीवादी व्यवस्था पर। हर बार की तरह इस बार भी थूक रहा हूँ गुस्से में इस पूंजीवादी व्यवस्था पर। लेकिन थूक के छींटें लौट के आ रही कुछ अपने ही चेहरे पर। कारण ...

असली इंडिया

" अरे सकलैन भाई कल अपनी बुलेट देना जरा ।" " काहे भैय्या " "अरे भाई वो हिन्दू वाहिनी की रैली में जाना है । " "हाहाहा तो गुप्ता तू दुकान बंद करके रैली में जायेगा ..." "भाई नेता जी से जान पहचान हो रही है, बुलेट से रैली में जाउँगा तो ...समझ न यार " "अच्छा ठीक है ले लेना भाई " कल शाम नोयडा में गुप्ता जी के दुकान पर गया था तो ये अद्भुत वार्तालाप सुनने को मिला । आज शायद गुप्ता जी सकलैन भाई के बुलेट से हिंदू युवा वाहिनी रैली में गये हों गे ।

नजरें

"अपनी आँखे धो के आओ " "क्यों ?" "क्योंकि तुम्हारी आखों पर मेरी नजरें चिपक रही हैं ..."  ;)   :) # लप्रेक

टेप्रेक - टेलिकाॅम प्रेम कथा

"मैं तेरा वोडाफोन और तू मेरी आईडिया " "ज्यादा रोमांटिक न बनो । मुझे तुम्हारे हच के बारे में भी पता है ..." # टेप्रेक  - टेलिकाॅम_प्रेम_कथा

होलिका दहन

होलिका दहन का आयोजन हो रहा था। पंडित जी सब को बता रहे थे कि कैसे होलिका ने प्रयास किया प्रह्लाद को जलाने का लेकिन वो बच गया था और होलिका ही जल गयी। सुनते ही यसोदा ठहाके लगा के हँसने लगी। " अब तू क्यों बच्चों की तरह हँस रही है ताई " पास खड़ा रवि ने आश्चर्य से यसोदा को देखा। " कुछ नहीं बिटवा, पुरानी बात याद आ गयी " " कौन सी पुरानी बात ताई। हमें भी तो बताओ " " अरे बात तेरे जनम से भी पहले की है। मेरे सास यानी तेरे दादी ने दहेज़ को लेके एक दिन मुझे जलाने की कोशिश की। मिटटी तेल डाल के माचिस लगा दिया। लेकिन जाने कैसे आग मेरे से पहले उसके हाथ में लग गयी। " कहते कहते एक पल के लिए कहीं खो सी गयी ताई। अगले ही पल फिर कहने लगी : " तो बबुआ जब भी ये होलिका वाली बात सुनती हूँ तो बुड्ढी का चेहरा याद आ जाता है और हँसी निकल ही जाती है। " रवि अवाक सा ताई की तरफ देख रहा था। " फिर क्या हुआ ताई... " "फिर झुमका गिरा बरेली के बाजार में.... फिर कुछ नहीं हुआ, जा अपना काम कर ।" कह के ताई हँसने लगी। रवि झेंप गया। सोचने लगा ताई ने...