पत्र पूरा होने से पहले मेरे शब्दों ने मेरा हाथ जकड़ लिया। पेन हाथ से छिटक कर दूर जा लुढ़का। लगभग गिरगिराते हुए मेरे भावुक मन ने मेरे ही रचित शब्दों से पूछा : "कितने निष्ठुर हो तुम, मैंने तुम्हे रचा, एक बच्चे की तरह स्नेह दिया। और तुम मुझे रोक रहे हो। सम्मान नहीं तो कम से कम मेरे फैसले का अपमान तो ना करो।" शब्द ने कुछ कहा नहीं लेकिन उन्ही शब्दों में से कुछ उभर के आया जो मेरी आँखों में चमक उठा: " माँ की आँखें तेरा रस्ता निहारे.... " फिर उन्ही शब्दों ने भावनाओं का बवंडर सा बना दिया, जिस मे मेरी आत्महत्या का फैसला बह चुका था।
लघुकथा अपने आप में एक सम्पूर्ण कथा होती है। इसे गागर में सागर कहें या फिर "देखन में छोटन लगे - घाव करे गंभीर " कहा जा सकता है।