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अप्रैल, 2015 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

दूर पड़े गीले गेंहूँ के दाने में से एक हरा पौधा फूट रहा था

मर गया किसान ! लहलहाते गेंहू की तस्वीर आँखों में दबाये । जिसे बेरहम मौसम ने कर दिया था बरबाद । उसके लहलहाते चिता पर सेंकी गइ रोटियाँ उसी गेंहूँ से । खाया जी भर के जिसे खद्दर टोपी धारी इंसानों ने । फिर सबसे बड़ा तोंद वाला बढ़ गया कुर्सी की ओर। दूर पड़े गीले गेंहूँ के दाने में से एक हरा पौधा फूट रहा था ।

बड़ा होने पर कितनी क़ुरबानी देनी पड़ती है

चिड़िया दिन भर इधर उधर फुदकती। रात को चुपचाप बूढ़े बरगद पर जाके बैठ जाती। बूढ़ा  बरगद अनेको चिड़िया का आश्रयदाता था। नन्ही चिड़िया उस पेड़ से काफी प्रभावित थी।  क़ैसे वो इतने चिड़ियों का आश्रय बन कर भी चुपचाप खड़ा रहता है। बिना किसी को मना किये। बिना कुछ  गर्व किये। चिड़िया ने कई बार सोचा कि काश वो पेड़ होती। भगवान ने आखिर उसकी सुन ली। चिड़िया को पेड़ बना दिया। अब तो वो अनेको चिड़ियों का आश्रय थी। कई दिन तक वो गर्व से फूले न समायी।  पर धीरे-धीरे वो ऊबने लगी थी। उसे अपना चिड़िया वाला फुदकना, स्वछन्द उड़ना याद आने लगा था।  अब वो समझ चुकी थी "बड़ा होने पर कितनी क़ुरबानी देनी पड़ती है। "

बारिश के रंग अनेक

"बारिश ने कितना रोमांटिक मौसम कर दिया है। चलो ना सी पी चलते हैं घूमने।" "अरे रहने दो आज मूड नहीं है।" "तुम न बड़े अनरोमांटिक हो। जाओ मैं तुमसे बात नहीं करती हुह्ह।" टों टों.. की आवाज के साथ फोन काट चुका था। कह नहीं पाया की आज सुबह बाबू जी का फोन आया था। इसी बारिश ने लहलहाती फसल बर्बाद कर दी थी।

इश्क़ वाला लव

"भीड़ है। मैं हूँ तुम हो। अब तो मैं और तुम हम हो गए हैं। भीड़ चल रही है। हम भी तो चल रहे हैं भीड़ के साथ। लेकिन ऐसा क्यों लगता है उड़ रहे हैं हम। इश्क़ का असर है शायद। अच्छा कभी गौर से देखो तो लगेगा हर शख्स उड़ रहा है। शरीर जमीं पर है लेकिन इश्क़ ने जैसे उठा रखा है सबके रूह को ऊपर। उस से कुछ ही ऊपर तो खुदा का दर है। देखो ना , इश्क़ का रंग जिसका जितना गहरा हो रहा है रूह उतनी ऊँची उठ रही है। तुम देख रही हो ना..?" "उम्म... हुम्म.... देखो ये आखिरी पेग था। अब हमें सो जाना चाहिए। तुम क्या बोल रहे हो मैं कुछ नहीं समझ पा रही हूँ। गुड नाईट...लव यू। "