मर गया किसान ! लहलहाते गेंहू की तस्वीर आँखों में दबाये । जिसे बेरहम मौसम ने कर दिया था बरबाद । उसके लहलहाते चिता पर सेंकी गइ रोटियाँ उसी गेंहूँ से । खाया जी भर के जिसे खद्दर टोपी धारी इंसानों ने । फिर सबसे बड़ा तोंद वाला बढ़ गया कुर्सी की ओर। दूर पड़े गीले गेंहूँ के दाने में से एक हरा पौधा फूट रहा था ।
लघुकथा अपने आप में एक सम्पूर्ण कथा होती है। इसे गागर में सागर कहें या फिर "देखन में छोटन लगे - घाव करे गंभीर " कहा जा सकता है।