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भाई नमक खाया है !

"अबे इतनी शराब पिलायी है। अब तो बोलो वोट भैया जी को ही दोगे ना " अब वो बेचारा टुल्ल हो गया था... तो सच्चाई उगल बैठा "अरे शराब ही तो पिलाया है कौन सा हमने तुम्हारा नमक खाया है जो वोट ना दिए तो नमक हराम हो जायेंगे।" "साले तुम्हारी नियत जानता था। तभी शराब के साथ चखना भी है वो भी नमकीन। अब तो नमक खाया है। अब तो वोट दोगे ना भैय्या जी को " "मान गये भैया जी के साथ रहते रहते तुम भी पक्के नेता हो गये हो। अब तो वोट देना ही पड़ेगा नेता जी को। भाई नमक खाया है उनका " 

नन ऑफ़ योर बिज़नस

"देखो मुझे तुमसे प्यार नही है और ना ही था, तुम इतने गिल्टी कनसस मत होओ .."  "लेकिन ये आंसू ??" "नन ऑफ़ योर बिज़नस ...और तुम समझ भी नही सकते..!!"

इस कंटेंट को बेचा कैसे जाए

साहेब बेहद संजीदगी और अपनेपन से मिल रहे थे  दंगा पीड़ितों से। लोग भी भावुक हो कर रो रो कर बता रहे थे अपने दर्द को। बताएं भी क्यूँ नही इतना बड़ा आदमी उनके बीच कहाँ आता है। पूरे दिन झुग्गियों में भटकने के बाद जब  रात को साहेब अपनी बी एम डब्ल्यू  में अपने बंगले  कि तरफ प्रस्थान कर रहे थे तो एक ही बात उनके दिमाग में घूम रही थी -"हर एंगल से देख लिया, काफी कंटेंट जमा कर लिया है बस अब ये सोचना है कि इस कंटेंट को  बेचा कैसे जाए.।"

विडम्बना

" अरे मंगलसूत्र पायी  है, हिन्दू ही है रे … " " अल्ला हु अकबर, अरे उठा ले छोरी ने … " " बहुत दिनों बाद आज … हे हे हे …" " अल्लाह दी सों जे कोई हत्थ लावे तो … ऐसा करो सारे जेवर उतार लो …" " पर जेवर तो नक्को है मुस्ताक भाई …. इन्नी मेहणत बेकार किवें जांण दूँ.… " गरीब लोगां की किस्मत ही ….. साली जेवर होता तो बच ना जाती …" " बची तो वैसे भी ना है भाई ....रे अनवर तुम लोगां ने जे करना है कर ल्यो …. लेकिन लाशां थोरी दूर    फेंक्यो … मुस्ताक भाई ने बुरा लाग्यो है औरत जात दे नाल बदसलूकी …! "

पिछला दरवाजा

एक घर था। घर में रहने वाला इंसान साधारण सा था।   उसी घर में पीछे एक दरवाजा था। घर की एक परम्परा थी , जिसके मुताबिक कोई उस पिछले दरवाजे को खोलने की कोशिश नहीं करता..एक बार किसी ने कोशिश की थी तो वो पागल हो गया था ! लेकिन आज अचानक उस इंसान ने वो दरवाजा खोल दिया..! अन्दर देख कर हैरान हो गया.! वहां अजीब सी सरांध थी , अजीब सी खूशबू भी ..अँधेरा भी था , आँखें चुन्धियाने वाला उजाला भी ...!फिर उसने देखा कुछ अजीब से जानवर थे ..गधे , कुत्ता , मगरमच्छ , भेड़िया , हिरन , शेर, भालू और चूहे   ..! वो हैरान हो गया ये देख कर की सारे जानवरों के चेहरे इंसानी थे..! अरे ये तो उसी के चेहरे हैं...ये देखते ही पसीने पसीने हो गया...जोर की प्यास लगने लगी उसे..! तभी दूर दिखा सूली पर लटका हुआ कोई ...बिलकुल ईशा की तरह लेकिन सर पे नमाजी टोपी , दाढ़ी गुरुओं की तरह बढ़ी हुयी ...अनेक हाथ थे ..किसी में त्रिशूल, किसी में शंख ! फिर अचानक उस अजीब सी प्रतिमा का मुह खुला ...धीरे धीरे सब उसमे सामने लगे...सारे जानवर , प्रकाश-अन्धकार ...सब कुछ उसके मुखद्वार में प्रवेश करने लगा ...इंसान को लगा जैसे की कोई ...

कल आओगे न फिर से

अस्ताचलगामी सूरज को देख कर मन उदासी से भरने लगा था। ग्रीष्म का सूरज दिन भर कितना दर्द दिया था, कितनी ताप थी उसकी किरणों में। लेकिन जाते जाते कितना गंभीर लग रहा था और कितना लाल। शायद अपने किये पर शर्मिंदा था। ज्यों ज्यों दूर हो रहा था, नजरों में और विशाल लगने लगा था। झुलसे बदन की बैचेनी, विरह की कल्पनामात्र से गायब हो गयी थी।  जोर से पूछ बैठी "कल आओगे न फिर से" ।

जब जब बदली घिर जाती है

"अरे क्या कर रही हो भींग जाओगी ..." "आओ न तुम भी..." "अरे नहीं नहीं भींग जाऊंगा.. खुद तो बीमार पडोगी मुझे भी बीमार कर दोगी.." "कितने डरते हो तुम अच्छा एक मिनट हाथ देना मैं भी ऊपर आ जाऊ ..." "ये लो अरे खींच क्यूँ रही हो  ओहो  ये क्या किया तुमने देखो भींग गया मैं भी .." "हाहाहा तो क्या क्या हुआ वैसे भी कागज़ के तो हो नहीं ..वैसे सच बताओ लग रहा है न अच्छा ? " ह्म्म्म… मैंने सर हिला  दिया एक मुस्कान के साथ और कस  के भींच लिया उसे अपनी बाहों में । सालों बीत गये इस बात के लेकिन आज भी जब जब बदली घिर जाती है , बारिश की पहली बूँद जब कभी मेरे तन छू जाती है तो एक पगली सी लड़की की याद मुझे आ जाती है.। 

कुत्ते से सावधान

एक मंत्री जी को सबसे इमानदार नेता का अवार्ड दिया गया क्यूंकि उन्होंने अपने बंगले के बाहर लिखवाया था "कुत्ते से सावधान"...!

चुप चाप उठ के चल पड़ा वो अपनी मूर्ति को संभाले

धक् धक् धक् धक्। ट्रेन की तरह दिल धड़क रहा था। आज एक दशक बाद उसे देखने वाला था। मिलन के बाद विरह और विरह के बाद फिर से मिलन। प्रेम की सम्पूर्णता का एहसास उसके दिल को रोमांचित कर रहा था मिलन के दिन यूँ तो बमुश्किल १० ही थे लेकिन एक एक दिन की गाथा में महाकाव्य रचा जा सकता था। उसके बाद के हिज्र के दिनों में  बस दर्द और वियोग की भावनाओं का पराकाष्ठा था। प्रेम जीवन के रात्रि समान इन काले वर्षो में एक मात्र उससे मिलने की उम्मीद की रौशनी ने उसे जीवित रख्खा था। मन आँगन में उसकी जमी हुयी मूर्ति को रोज़ याद रूपी सुनहले पोछे से वो चमकाया करता था.। तभी दूर से आती हुयी दिखी वो। अब तो धड़कन शताब्दी की रफ़्तार पकड़ चुकी थी। लेकिन ज्यों ज्यों वो पास आने लगी। उसके मांग की सिंदूर और गले का मंगलसूत्र बिलकुल स्पष्ठ दिखने लगा.।  धड़कन अब मंथर हो गयी थी। सिन्दूर का रंग चुभने लगा उसे, रंग और गाढ़ा हो चला था। मांग में फैला सिंदूर उसे अपने चारो ओर उड़ता हुआ दिखने लगा था। मन में छाये इस सिन्दूरी बवंडर में प्रेम कही खोने लगा था। खुद को सम्भाला उसने।गौर से देखन...

हम ठहरे समाजवादी

मंत्री साहब अपने बंगले से निकलने वाले ही थे की ..श्रीमती जी आ गयीं..   "अजी सुनते है ...आप भी चलिए न हमरे साथ रामलला के दर्शन करने ..." "पागल हो गयी है क्या ...इलेक्शन सर पे है और हम ठहरे समाजवादी...अगर कही अख़बार में फोटो -वोटो आ गया तो माइनॉरिटी वोट तो गया हाथ से ...अरे चलना ही है तो शिव मंदिर चलो, कृष्ण मन्दिर चलो...इ अयोध्या जाना है तो हम साथ नही जा सकते बस...."

परिवर्तन

भाग रहा था वो, हाथो में नुकीला हथियार लिए , निशाना साधा और दे मारा। अचूक निशाने और उसके भुजबल के समक्ष वो हिरण शावक अपनी जिन्दगी हार चुका था। पशु से मनुष्य के परिवर्तन के बीच गायब हुई पाशविकता एक अग्निज्वाला  की तरह प्रकट हुई जो शिकारी के  अट्टहास और हिरन की दर्दनाक चीख को अपने में समाये जा रही थी। छटपटाहट  अपने चरम पर थी। धीरे धीरे हिरण  शावक  का शरीर शिथिल पड़ गया। शिकारी  अपने नुकीले दांतों से फाड़ने लगा उसके मांस को। धीरे धीरे उसके अन्दर आनंद भरने लगा.. इसी मस्ती में वो मांसहीन  हड्डियों के सुराख से आवाजें निकालने लगा। लेकिन ये क्या, बेसुरी आवाज अचनक सुरीली होते होते दर्दनाक होने लगी। शायद कोई अदृस्य शक्ति रही होगी, वो  रुकना चाह रहा था लेकिन  वो बजाता रहा। हड्डी  से बांसुरी सी धुन निकलने लगी। बहती  हवा ने इस धुन में अजीब सी थिरकन ला दी। पहली बार श्रृष्टि इस अद्भुत दृश्य को देख रहा था। अचनक हिरण शावाक की आँखें दिखी उसे। प्राण पखेरू निकल...

पंखुड़ी जमीन पर

ऋतुराज के आने से सब कुछ बदल सा गया था। अक्सर छुपा रहने वाला सूरज अपनी नरमी बिखेर रहा था.। शीतल मलय इसके संपर्क में आके थोड़ी सी उष्ण हो चुकी थी.।  भ्रमर पुष्पपरागपान से उन्मत्त हो कर स्वरलाहिरी बिखेर रहे थे.। पुष्प अपना पराग लुटा कर  भी अति मनहर प्रतीत हो रहे थे । सब कुछ इतना मनोरम था जैसे श्रृष्टि अपनी यौवनावस्था में फिर से प्रवेश कर गयी हो। लेकिन इन सबके बीच में उपवन में बैठा देवपुरुष  सदृश  नवयुवक की दृष्टि  कही अटक सी गयी थी...एक गुलाब के पुष्प पर । निस्संदेह उस वाटिका का सबसे सुन्दर पुष्प  था वो । पुष्प को देख युवक मुग्ध सा हो गया था। लेकिन धीरे धीरे एक अकुलाहट सी आ गयी उसके मन में । मोहपाश में बंधकर वो पास आ गया उस पुष्प के. . अकुलाहट और बढ़ गयी ...स्पर्शातुर हाथ बढ़ गये उस पुष्प की ओर, अब अकुलाहट अपने चरम पर थी...उन्मत्त सा हो गया था युवक । जाने क्या हुआ उसने तोड़ दिया उस पुष्प को । अचानक एक मर्मभेदी आह सी निकली.... भ्रमरों का गान कर्कश हो गया ...सूर्य कुछ शर्मसार सा हो के बादलों में छुपने लगा....हवा में भी एक पैन...

१५ अगस्त को स्कूल बंद है

"पापा मैं इस बार भगत सिंह बनने वाला हूँ ,स्कूल में जो इंडिपेंडेंस डे फंक्शन होगा उसमे। आप बस मेरे लिए एक हथकड़ी और पगड़ी ला दो" "ओके बेटा ला दूँगा ...पर बेटा १५ अगस्त तो परसों है, कल ला दूँगा।" "नहीं पापा ,परसों स्कूल बंद है, कल ही फंक्शन होगा।" "पर बेटा परसों तो झंडा फ़हराया जाएगा ना स्कूल में … तो स्कूल बंद कैसे हो सकती है " "ये सब मुझे नहीं पता … आप आज ही ला दो जो मैंने कहा है बस।  बच्चा कहते कहते निकल गया कमरे से … लेकिन  १५ अगस्त को आजकल स्कूल बंद रहता है ये सरकारी स्कूल में पढ़े पापा के दिमाग में घुस नहीं रहा था.।

बेस्ट ग्रोथ रेट

प्रज्वल्लित चिताग्नि में स्वाहा हो रही थी कई दिन से जल रही जठराग्नि। मांस के जलने की गंध मिल रही थी खदान से आ रही कोयले के गंध से। सारा जीवन कोयले की खान में मजूरी करते करते उसके जिस्म में भी कोयले की गंध घुस गयी थी। पूरा जिस्म जलकर धुंआ हो चुका था, केवल कटे हुए उसके पैर पर कुछ मांस बचे थे जो चील कौए एक हफ्ते से खाने की कोशिश में लगे थे। । इसी धुएं में कुछ गाडियों के धुंए भी मिल रहे थे। मुख्यमंत्री अपने काफिले संग लौट रहे थे अवार्ड लेकर बेस्ट ग्रोथ रेट का।

इकबाल

ये जिजीविषा ही थी जिसने एक पांच वक़्त के नमाजी को हिन्दू बनने पर मजबूर कर दिया। दो ही रास्ते थे या तो हिन्दू बन जाओ या फिर पुरुखों की इस मिटटी में अपने अपने तमाम यादो को दफ़न कर पाकिस्तान चले जाओ। यूँ तो वो न ही अपने  मकान को  बचा सके, न ही अपने परिवार को  और ना ही अपने उस  गाँव को । जालिमों ने सरहद पार के जुल्म का बदला उनके छोटे से गाँव को जला कर ले लिया था. अपने बेजान से जिस्म को बचाकर किसी तरह दिल्ली ले आये। नाम तो वही था बस उपनाम बदल लिया था उन्होंने इकबाल मोहम्मद से इकबाल चंद हो गये. जिस घर में ठहरे थे उसी घर की एक बाल विधवा से विवाह कर फिर से परिवार बसा लिया।पहले के सच को एक कुरान शरीफ के साथ बंद कर एक बक्से में रख दिया।आज जब आखिरी साँसे गिन रहे थे उनसे रहा नहीं गया . बेटे से वो छोटा बक्सा मंगवाया जो सबके लिए कौतुहल का विषय था लेकिन आज तक जिसके बारे में किसी को कुछ नहीं पता था। कांपते हाथों से चुचाप  उसमे से कुरान शरीफ निकाला। पहले आँखों में फिर सर पे लगाया । पूरे शरीर में एक कम्पन सी हुई फिर आँखें बंद हो गयी...

लेकिन बेटा ये जश्न ना मनाया जाता है हमसे

बात उन दिनों की है जब मैं पंजाब में अपने इंजीनियरिंग के पहले वर्ष में था ..दिन १५ अगस्त का था ...लेकिन बहुत अजीब लग रहा था ...सुबह सुबह चाय पीने कैंटीन पंहुचा तो जगतार सिंह जी दिख गये ...८० साल का सरदार..लेकिन अभी भी दुरुस्त दिखते थे ... "चाचा मुझे तो लगता ही नही की आज १५ अगुस्त है ..कही कोई उत्साह ही नही दिख रहा ...हमारे यहाँ तो सुबह से लाउडस्पीकर पर देशभक्ति के गाने बजने लगते ...प्रभात फेरी झंडोत्तोलन और ...मुझे तो लगता ही नहीं की ये वही पंजाब है जिसने सबसे ज्यादा देशभक्त पैदा किये हैं ..भगत सिंह , लाला लाजपत राय..." कुछ देर चुचाप सुनने के बाद वो बोले:- "ओये पुत्तर , जिस आजादी के लिए अपने लाल कुर्बान किये इस पंजाब ने उसी आजादी ने इस पंजाब के दो टुकड़े कर दिए ...अपने ही घर में इधर से उधर भगाया गया लोगों को ... मार, काट, बलात्कार ...और ८४ का वो दंगा उसके भी बीज तो इसी आजादी ने ही डाले थे... देश के लिए आज भी जान देने की बारी आये तो सबसे आगे पंजाबी ही होंगे ...लेकिन बेटा ये जश्न ना मनाया जाता है हमसे ..." कहते कहते अजीब सा चेहरा हो गया था उनका...!!!

हम सब बंजारे हैं जग में

कुछ बंजारे, सड़क किनारे,तम्बू गाड़े... एक लकड़ी की गठरी,अलमुनियम के कुछ बर्तन,बीच से पिचके , किनारे से मुड़े हुए दो चूल्हे जले हुए आंच देती चूल्हों को बंजारन, एक बुढ्ढी  और एक जवान मिटटी पर लेटा एक अबोध,मंजे पर निश्चिंत सा औंधा एक अधेड़ एक वृद्ध चीलम की आग को सुलगाते हुए  दो बच्चे नंगे-पुंगे से, बत्ती लाल होते ही भाग जाते रुकी हुयी गाड़ियों के पास सीसे के बाहर से मांगते हुए,अजीब सी भाव भंगिमा बनाते... पिछले कुछ दिनों से रोज इस बत्ती के पास अपनी गाडी धीरे कर लेता हूँ मैं देखने में एक अजीब सा आनंद मिलता, ठीक वैसा ही जैसा चुभा हुआ कील निकलने पर होता है कभी कभी बत्ती हरी भी रहती है फिर भी रुक जाता हूँ। अब तो उनके चेहरे भी पहचाने से लगने लगे हैं लेकिन आज जब वहां पंहुचा तो कुछ भी नहीं था। जाने क्यूँ अपने के बिछड़ने जैसा दुःख हुआ। लेकिन आखिर बंजारे ही थे वो, एक जगह टिकना ना उनकी आदत होती है और ना ही नियति। जाने क्यूँ बचपन में सुना वो गीत कानों में बजने लगा "हम सब बंजारे हैं जग में , मिटटी बालू जोड़ के.. मूरख घर बनवाए फिर इससे मोह लगाये....

बच्ची थोड़े न हैं हम..

"अरे मॉम, आज घर नही आउंगी..दोस्तों के साथ नाईट आउट का प्लान है..." "पर बेटा वो ..." "अरे मम्मा डोंट वर्री बच्ची थोड़े ना हूँ ... अच्छा रखती हूँ ..बाय ..." वैय्जंती सोच में पर गयी ...जिस तरह से उसकी बेटी ने बच्ची थोड़े न हूँ कहा था ..वो अतीत में खो गयी ..वो भी तो प्रदीप से मिलने काली मंदिर के पास जाती थी अपनी माँ से यही कह के.. "अरे माँ ..आप चिंता न कीजिये ...हम सिलाई सिखने ही तो जा रहे हैं...बच्ची थोड़े न हैं हम ..."

कैसा भुक्खर है...

"कैसा भुक्खर है ... तब से खाए जा रहा है.... कहा से लाया होगा इतना खाना इ भिखारी  ..." "अरे भैया  उ बाइक का एक्सीडेंट नही हुआ था रोड के उस पार ...अरे वही जिसमे एगो लौंडा अधमरा हो गया था...वही से उठा के लाया है ...लोग सब लईका के उठा रहे थे ....और इ ससुर चुप्पे से वहां गिरा खाने का थैली मार आया ..." "और तुम पान दुकान पे बैठ के इहे सब तमाशा देखते रहते हो जी  ...हे हे हे हे..."

मुबीन !

मुबीन ! ये नाम पहली बार कब सुना याद नहीं पर मुबीन कहता था कि "मालिक आपका पहला मुंडन (तब  मैं करीब २.५ साल का था ) मैंने  ही किया था और तो और आपके पिताजी का भी"। कहते कहते एक अधिकार भाव झलकने लगता था उसके चेहरे पर.। मुबीन हज्जाम था हमारे गॉंव का.। पहले आज कि तरह सलून नहीं होते थे गॉंवों में ...। बाबा कहते थे कि हमने भी कुछ जमीन दिया है इसको और गांव  के कुछ और लोगों ने भी दिया है। बाकी लोग या तो कुछ चावल गेंहू दे देते थे  या फिर कुछ तो मुफ्त में ही बना के निकल लेते थे .। फिर भी कभी उसके चेहरे पे कोई शिकन नही दिखी। हमेशा मुस्कुराता रहता था.। याद है  जब बहुत सालो बाद गावं गए तो अचानक से मुबीन बिदक गया था मेरे सफाचट मूंछ दाढ़ी को देख कर। बोलने लगा मालिक आप लोग तो मेरा सगुन का धोती और बख्शीश  मार लिए। बाद में पता चला की पहले दाढ़ी बनाने पर उसे ये सब मिलता। अब उसके पिचके गालों पर उभरी गुस्से की रेखा को देख अफ़सोस होने लगा था। खैर बात आई और  गयी। लेकिन इस बार जब गावं गया तो अचानक से याद आ गया वो। चौक पर खुले नए सलून ...

वैसे भी जीते तो हम अपने बच्चों के लिए ही हैं

4 महीने ही तो बचे हैं नौकरी के.. वैसे भी ६० के होने वाले है.. जिंदगी में सब कुछ मिला, घर परिवार , सम्मानित नौकरी स्कूल हेडमास्टर की…. बस चिंता है एकलौता बेटे की, कहीं नौकरी मिल जाती तो भविष्य बन जाता , वैसे भी चैन से तभी मर सकता हूँ जब लगेगा की उसका भविष्य सुरक्षित है ... सुना है अगर नौकरी में रहते मर जाऊ तो अनुकम्पा पर नौकरी मिल जाती है बेटे को...इससे अच्छी मौत क्या हो सकती है....वैसे भी जीते तो हम अपने बच्चों के लिए ही हैं...

उलझन

बीच आँगन में लाश रखा गया है । सब बिन्नी को हौसला दे रहे हैं । आखिर उसके पिता के देहांत के बाद इसी चाचा ने आसरा दिया था उसे और उसकी माँ को। लेकिन बिन्नी  बिलकुल खामोश है , कही अतीत में खोई हुई। "अरे बेटी क्या हुआ भैया नही रहे तो ,मुझे अपना पापा समझो .." कहते कहते सीने से लगा लिया था। एक अजीब सा अपनापन लगा था उसे ।लेकिन समय के साथ साथ ये आशीष भरा आलिंगन चुभने लगा था।चाचा का इधर उधर स्पर्श करना उस समय तो नही लेकिन बड़ी होने पर समझने लगी थी बिन्नी। आज सामने उसी चाचा की लाश है और अजीब सी उलझन में है बिन्नी । समझ नही पा रही है की समाज द्वारा देवता घोषित  चाचा के लाश पर फूट फूट  कर रोये या फिर इस घिनौने  पापी के लाश को खींच कर एक थप्पड़  दे।

डूग डूग डुग ....डूग डूग डुग ...

डूग डूग डुग ....डूग डूग डुग ... ये आवाज सुनते ही  तीर की तरह लपकते हुए हम  बाहर पहुँच जाते थे ... "ऐ सुखिया एगो २ टकिया बरफ दे ना " "पहिले  कल वाला पैसा मलकिनी से मांग के दीजिये " "अरे धीरे बोलो माँ सुनेगी तो मारेगी " "देखिये हम ऐसे फीरी में बरफ नहीं बांटते  है…जाईये आज नहीं मिलेगा ..." पांच मिनट तक मिन्नत करने के बाद ... भारी क़दमों से जब  वापस जाने लगते तो .. पीछे से हर बार की तरह आवाज सुनाई  देती थी, "आईये ...लेकिनि आखिरी बार ही दे रहे हैं ...कल से उधार नहीं मिलेगा ..." आज भी जब किसी आइस  क्रीम पार्लर में जाता हूँ सोचता हूँ कही से सुखीया के डमरू की आवाज आएगी शायद ... डूग डूग डुग ....डूग डूग डुग ...

कम से कम उस कृष्ण की तरह अपनी राधा को तो नही भूलोगे ना

"देखो अगर कृष्ण को आराध्य मानती हो तो राधा की तरह प्रेम करो, रुक्मिणी तो बस रानी मात्र थी ...कृष्ण का प्रेम तो राधा के लिए ही था ... " "लेकिन मैंने तो तुम्हे पुरुषोत्तम माना है....मुझे तो सीता बनना है ...सास-ससुर हो, दो पुत्र हो ... पति इतना प्रेम करे की मेरे लिए महाबली लंकेश से भी युद्ध कर ले..."    "लेकिन सीता तो विवाह से पहले राम से मिली भी नही थी....." . . . "चलो कोई बात नही, कम से कम उस कृष्ण की तरह अपनी राधा को तो नही भूलोगे ना..."  "अरे नहीं बाबा ..अब फ़ोन रखो भी ...होने वाली बीबी का फ़ोन आ रहा है ...और तुम तो समझती ही हो ...."

बड़े लोग सब काम सलीके से करते हैं ...है ना साहेब !

लडखडाती चाल, मुँह से आती बास, उबली हुई लाल लाल आँखें ...धुत्त था बिलकुल वो ...अभी अभी गालियों की लम्बी बौछाड़ मार के सुस्ता रहा था ... "क्या देख रहे हो उधर साहब झुग्गियों के लिए आम बात है ये ..." "लेकिन यार लगता ही नही की ये भी दिल्ली ही है...." "अरे छोडो साहब, ये बताओ माल (चरस) कितने का चाहिए ..." "४०० का दे दे…" "साहब, आप लोगों के हाई सोसाइटी में भी तो ये सब होता है ना ...उधर डिफेंस कॉलोनी में मैं काम किया १० साल ...लेकिन साहेब उधर ठीक है ...घर बड़ा होता है न ...सब कुछ अन्दर ही दब जाता है ...बाहर कुछ नहीं आता ...यहाँ बेचारे एक कमरे के घर में पूरी फैमिली....किधर को चिल्लाएगा ...बड़े लोग सब काम सलीके से करते हैं ....है ना साहेब ...." "अच्छा अच्छा अब तू मूड ख़राब मत कर ....माल दे, भाषण मत पेल ...."

भाई इस इंसान का भरोसा नहीं करना...

टूटते हुए ख्वाब ने नवजात ख्वाब से जाते जाते कहा " भाई इस इंसान का भरोसा नहीं करना...जब मैं भी जन्मा था ...मुझे सजाया संवारा ...सोते जागते मेरे बारे में ही सोचा करता ...पर आज जब मैं मरने के कगार पर हूँ, ये इंसान मुझे कोई तवज्जो ही नहीं दे रहा है ...चुपचाप नए ख्वाब बुनने में तल्लीन है...." नया वाला जो अब तक चहक रहा था ..अचानक ही गुमसुम सा हो गया.....

बताओ क्या जवाब दूँ

आँखें जो अब तक चुम्बक की तरह चिपकी थी ...हाथ जो फेविकोल के जोड़ की तरह जुड़े थे ...कान जो बाहरी शोरगुल को फ़िल्टर करके बस उसकी साँसों को सुन रहे थे ..अधर जिसपे अभी भी उसके लिपस्टिक की खुसबू थी ....मन में प्रेम, गुलाबी आँचल ओढ़े नाच रहा था .... अचानक उसके चंद शब्दों ने वज्रपात सा कर दिया मनःस्थिति पर .. " कल मेरे बेटे ने तुम्हारे बारे में पूछा था की ये अंकल कौन लगते हैं आपके , मम्मी.." ".........बताओ क्या जवाब दूँ उसको......?????"

देखने में कैसा लगता है इ टेररिस्ट लोग

"अबे चल इंट्रो दे ..." "सर माइसेल्फ .... , ऍम फ्रॉम कश्मीर ..." "अबे कश्मीरी है बे ...अबे फिर तो टेररिस्ट को देखा होगा ...अबे बेंचो बता न बे देखने में कैसा लगता है इ टेररिस्ट लोग ...""....." अबे बोलता क्यूँ नही है बे ..... कुछ देर चुप रहने के बाद उसने पर्स से एक तस्वीर निकाली ... "सर चचा हैं हमारे ...अभी जेल में हैं ..सरकार के नजर में टेररिस्ट हैं.. लेकिन लगते बिलकुल मेरी तरह ही हैं ..."

एक दशक से जो जमा था पिघलने लगा था

विरह के दर्द और असह्य हो जाते जब उसे लगता की शायद एकतरफा ही प्यार किया है उसने। 10 साल से उसी के नाम पर रोया है बस ....यूँ तो कभी कभी उसकी गहरी आँखों में भी कुछ प्रेम नजर आता था किन्तु इससे बस इतना फायदा था की वो उसे कभी बेवफा नहीं कह सकता था। पर अचानक आज कई सालों के बात जब उससे मुलाकात हुई तो लगा की तपस्या पूर्ण हो गयी .. बातों बातों में उसने बता दिया की ... "वो भी उससे उतना ही प्रेम करती थी, जितना की वो उसको करता था" ...लेकिन उसके पति बहुत अच्छे हैं और एक क्यूट सा बच्चा भी है। अचानक ही उसके दिल में अजीब सी अकुलाहट आ गयी , शायद एक दशक से जो जमा था पिघलने लगा था।

रोजनामा

रात ,बिस्तर,ख्याल, सवाल, दिमाग, जवाब, दिल, उत्तर- निरुत्तर, तर्क- कुतर्क, उलझन, नींद, सपना और सुबह ...!!! (लघुतम कथा)

आखिर पंडित हैं हमलोग

"...लेकिन मम्मी मैं चार साल उसी के साथ हॉस्टल के एक ही रूम में रहा हूँ और एक ही थाली में खाया भी है ...और आप ये बात जानती हैं फिर अगर आज जब वो अपने घर आया है तो आप कह रही हैं की वो सबके साथ बैठ के नही खायेगा क्यूंकि वो मुस्लिम है ...!!! "देखो बेटा वो अच्छा लड़का है तुम्हारा अच्छा दोस्त भी है लेकिन तुम अपना धर्म भ्रष्ट कर लिए इसका ये मतलब नही हम भी अपना धर्म भूल जाएँ ...आखिर पंडित हैं हमलोग।
पहली नौकरी ...पहला दिन… प्रोजेक्ट मेनेजर  कोंफी  पीते पीते  कुछ समझा रहे थे ... "देखो अगर यहाँ टिक गये तो फ्यूचर बन जाएगा .... " अगले दिन सुबह सुबह एच आर का फ़ोन आया  …. "mr. kanchan  इज नो मोर.…कल एक दुर्घटना में मारे गये…" मेरे दिमाग में उनके फ्यूचर प्लानिंग वाली बात घुमने लगी।  

किस्मत का दोष

चिंट ने मारा  चींटी को और गंगा जी में डाल दिया।गंगा का रंग काला हो गया।कौवा ने देखा, तो पानी पीना छोड़ के उड़  गया।जंगल के बाकी जानवर भी आये पानी पीने के लिए लेकिन सब ने देखा की पानी का रंग तो अचानक काला हो गया है, तो उन्होंने ने भी पीना छोड़ दिया।अब ये खबर जंगल में आग की तरह फ़ैल गयी की अचानक नदी का पानी काला कैसे हो गया। खबर जंगल में  शेर के मांद से लेकर  चूहे के चाय की दूकान तक फ़ैल गयी। अब वो चिंट जो ये मानकर चल रहा था की हमेशा की तरह मामला दब जाएगा, ये सोचकर मरा जा रहा है मेरे ही समय पर इस गंगा के पानी को भी काला होना था।    क्रमशः .......