अस्ताचलगामी सूरज को देख कर मन उदासी से भरने लगा था। ग्रीष्म का सूरज दिन भर कितना दर्द दिया था, कितनी ताप थी उसकी किरणों में। लेकिन जाते जाते कितना गंभीर लग रहा था और कितना लाल। शायद अपने किये पर शर्मिंदा था। ज्यों ज्यों दूर हो रहा था, नजरों में और विशाल लगने लगा था। झुलसे बदन की बैचेनी, विरह की कल्पनामात्र से गायब हो गयी थी।जोर से पूछ बैठी "कल आओगे न फिर से" ।