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जुलाई, 2013 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

हम सब बंजारे हैं जग में

कुछ बंजारे, सड़क किनारे,तम्बू गाड़े... एक लकड़ी की गठरी,अलमुनियम के कुछ बर्तन,बीच से पिचके , किनारे से मुड़े हुए दो चूल्हे जले हुए आंच देती चूल्हों को बंजारन, एक बुढ्ढी  और एक जवान मिटटी पर लेटा एक अबोध,मंजे पर निश्चिंत सा औंधा एक अधेड़ एक वृद्ध चीलम की आग को सुलगाते हुए  दो बच्चे नंगे-पुंगे से, बत्ती लाल होते ही भाग जाते रुकी हुयी गाड़ियों के पास सीसे के बाहर से मांगते हुए,अजीब सी भाव भंगिमा बनाते... पिछले कुछ दिनों से रोज इस बत्ती के पास अपनी गाडी धीरे कर लेता हूँ मैं देखने में एक अजीब सा आनंद मिलता, ठीक वैसा ही जैसा चुभा हुआ कील निकलने पर होता है कभी कभी बत्ती हरी भी रहती है फिर भी रुक जाता हूँ। अब तो उनके चेहरे भी पहचाने से लगने लगे हैं लेकिन आज जब वहां पंहुचा तो कुछ भी नहीं था। जाने क्यूँ अपने के बिछड़ने जैसा दुःख हुआ। लेकिन आखिर बंजारे ही थे वो, एक जगह टिकना ना उनकी आदत होती है और ना ही नियति। जाने क्यूँ बचपन में सुना वो गीत कानों में बजने लगा "हम सब बंजारे हैं जग में , मिटटी बालू जोड़ के.. मूरख घर बनवाए फिर इससे मोह लगाये....

बच्ची थोड़े न हैं हम..

"अरे मॉम, आज घर नही आउंगी..दोस्तों के साथ नाईट आउट का प्लान है..." "पर बेटा वो ..." "अरे मम्मा डोंट वर्री बच्ची थोड़े ना हूँ ... अच्छा रखती हूँ ..बाय ..." वैय्जंती सोच में पर गयी ...जिस तरह से उसकी बेटी ने बच्ची थोड़े न हूँ कहा था ..वो अतीत में खो गयी ..वो भी तो प्रदीप से मिलने काली मंदिर के पास जाती थी अपनी माँ से यही कह के.. "अरे माँ ..आप चिंता न कीजिये ...हम सिलाई सिखने ही तो जा रहे हैं...बच्ची थोड़े न हैं हम ..."

कैसा भुक्खर है...

"कैसा भुक्खर है ... तब से खाए जा रहा है.... कहा से लाया होगा इतना खाना इ भिखारी  ..." "अरे भैया  उ बाइक का एक्सीडेंट नही हुआ था रोड के उस पार ...अरे वही जिसमे एगो लौंडा अधमरा हो गया था...वही से उठा के लाया है ...लोग सब लईका के उठा रहे थे ....और इ ससुर चुप्पे से वहां गिरा खाने का थैली मार आया ..." "और तुम पान दुकान पे बैठ के इहे सब तमाशा देखते रहते हो जी  ...हे हे हे हे..."

मुबीन !

मुबीन ! ये नाम पहली बार कब सुना याद नहीं पर मुबीन कहता था कि "मालिक आपका पहला मुंडन (तब  मैं करीब २.५ साल का था ) मैंने  ही किया था और तो और आपके पिताजी का भी"। कहते कहते एक अधिकार भाव झलकने लगता था उसके चेहरे पर.। मुबीन हज्जाम था हमारे गॉंव का.। पहले आज कि तरह सलून नहीं होते थे गॉंवों में ...। बाबा कहते थे कि हमने भी कुछ जमीन दिया है इसको और गांव  के कुछ और लोगों ने भी दिया है। बाकी लोग या तो कुछ चावल गेंहू दे देते थे  या फिर कुछ तो मुफ्त में ही बना के निकल लेते थे .। फिर भी कभी उसके चेहरे पे कोई शिकन नही दिखी। हमेशा मुस्कुराता रहता था.। याद है  जब बहुत सालो बाद गावं गए तो अचानक से मुबीन बिदक गया था मेरे सफाचट मूंछ दाढ़ी को देख कर। बोलने लगा मालिक आप लोग तो मेरा सगुन का धोती और बख्शीश  मार लिए। बाद में पता चला की पहले दाढ़ी बनाने पर उसे ये सब मिलता। अब उसके पिचके गालों पर उभरी गुस्से की रेखा को देख अफ़सोस होने लगा था। खैर बात आई और  गयी। लेकिन इस बार जब गावं गया तो अचानक से याद आ गया वो। चौक पर खुले नए सलून ...