कुछ बंजारे, सड़क किनारे,तम्बू गाड़े...
एक लकड़ी की गठरी,अलमुनियम के कुछ बर्तन,बीच से पिचके , किनारे से मुड़े हुए
दो चूल्हे जले हुए
आंच देती चूल्हों को बंजारन, एक बुढ्ढी और एक जवान
मिटटी पर लेटा एक अबोध,मंजे पर निश्चिंत सा औंधा एक अधेड़
एक वृद्ध चीलम की आग को सुलगाते हुए
दो बच्चे नंगे-पुंगे से, बत्ती लाल होते ही
भाग जाते रुकी हुयी गाड़ियों के पास
सीसे के बाहर से मांगते हुए,अजीब सी भाव भंगिमा बनाते...
पिछले कुछ दिनों से रोज इस बत्ती के पास अपनी गाडी धीरे कर लेता हूँ मैं
देखने में एक अजीब सा आनंद मिलता, ठीक वैसा ही जैसा चुभा हुआ कील निकलने पर होता है
कभी कभी बत्ती हरी भी रहती है फिर भी रुक जाता हूँ।
अब तो उनके चेहरे भी पहचाने से लगने लगे हैं
लेकिन आज जब वहां पंहुचा तो कुछ भी नहीं था। जाने क्यूँ अपने के बिछड़ने जैसा दुःख हुआ। लेकिन आखिर बंजारे ही थे वो, एक जगह टिकना ना उनकी आदत होती है और ना ही नियति।
जाने क्यूँ बचपन में सुना वो गीत कानों में बजने लगा
"हम सब बंजारे हैं जग में ,
मिटटी बालू जोड़ के.. मूरख घर बनवाए
फिर इससे मोह लगाये..."
एक लकड़ी की गठरी,अलमुनियम के कुछ बर्तन,बीच से पिचके , किनारे से मुड़े हुए
दो चूल्हे जले हुए
आंच देती चूल्हों को बंजारन, एक बुढ्ढी और एक जवान
मिटटी पर लेटा एक अबोध,मंजे पर निश्चिंत सा औंधा एक अधेड़
एक वृद्ध चीलम की आग को सुलगाते हुए
दो बच्चे नंगे-पुंगे से, बत्ती लाल होते ही
भाग जाते रुकी हुयी गाड़ियों के पास
सीसे के बाहर से मांगते हुए,अजीब सी भाव भंगिमा बनाते...
पिछले कुछ दिनों से रोज इस बत्ती के पास अपनी गाडी धीरे कर लेता हूँ मैं
देखने में एक अजीब सा आनंद मिलता, ठीक वैसा ही जैसा चुभा हुआ कील निकलने पर होता है
कभी कभी बत्ती हरी भी रहती है फिर भी रुक जाता हूँ।
अब तो उनके चेहरे भी पहचाने से लगने लगे हैं
लेकिन आज जब वहां पंहुचा तो कुछ भी नहीं था। जाने क्यूँ अपने के बिछड़ने जैसा दुःख हुआ। लेकिन आखिर बंजारे ही थे वो, एक जगह टिकना ना उनकी आदत होती है और ना ही नियति।
जाने क्यूँ बचपन में सुना वो गीत कानों में बजने लगा
"हम सब बंजारे हैं जग में ,
मिटटी बालू जोड़ के.. मूरख घर बनवाए
फिर इससे मोह लगाये..."
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