प्रेम का आकर्षण ही था जिसने उसके मन में खलबली मचा थी । मन उसे अजनबी डर से डरा भी रहा था, तो मन उसे प्रेम के सागर की ओर धकेल भी रहा था । उसने मन के अंदर देखा तो उसे दिखा कि मन के अंदर भी बहुत सी औरते थी। जो हाथ जोड़े एक दूसरे को खींचे खड़ी थी। वो हाथ का जोड़ ऐसा था मानो एक सुरक्षा कवच की तरह था। लेकिन प्रेम के प्रकाश में वो कवच बंधन नजर आ रहा था। ऐसा बंधन जिसने हर औरत को सदियों से अंदर तक जकड रखा था। प्रेम के खिंचाव ने जुड़े हुए हाथों को खोल दिया था। मन के अंदर की सारे औरतें हाथ छूटते ही गायब हो गयी । अब वो स्वछंद थी । उसने प्रेम के सागर में छलाँग लगाया। लेकिन प्रेम की खासियत थी इसमें डूबने वाला उपर उठ जाता था । अब वह प्रेम के अनंत आकाश में उन्मुक्त उड़ान भर रही थी ।
लघुकथा अपने आप में एक सम्पूर्ण कथा होती है। इसे गागर में सागर कहें या फिर "देखन में छोटन लगे - घाव करे गंभीर " कहा जा सकता है।