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मार्च, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

सामंजस्य

"सपना कहाँ अटकी है तू भी... पुरानी परम्परा और रीति-रिवाजों में। अरे इतनी बड़ी वैज्ञानिक है, खुद की एक पहचान है, नाम है। फिर भी ऐसा लगता है मानो तुम्हारे एक पैर में रूढ़िवादिता की बेड़ी जकड़ी है।" "नीलम, जानती हो बड़ा आसान है मेरी लिए इन रीति रिवाजो और अवैज्ञानिक रूढिवातीता को तोड़ देना। लेकिन मेरी माँ या बाबूजी की सोच तो अलग है ना। और उनकी ख़ुशी के लिए ये बेड़ी मैं कभी तोड़ ही नहीं सकती। बेशक मेरी उड़ान के लिए मुझे दोहरी मेहनत करनी पड़े।" "तो क्या तुम उनकी ख़ुशी के लिए अपनी ख़ुशी का गाला घोंट...." "कैसी बात कर रही है नीलम। अरे उनकी ख़ुशी में भी तो मेरी ख़ुशी ही है और आजादी की ये उड़ान तो माता-पिता ने ही सिखाया है तो उनके लिए कभी कभी ये परम्परा की बेड़ी मैं न पहन सकती क्या ?" नीलम ने आसमान में देखा कुछ चिड़िया झुंड में उड़ रहे थे। उस झुंड की एक चिड़िया जो ऊँची उड़ान ले सकती थी शायद लेकिन झुण्ड के साथ ही सामंजस्य बिठा रही थी। चिड़ियों की चहचहाहट के बीच नीलम उस चिड़ियाँ की आवाज सुनने की कोशिश करने लगी। वो उस स्वरबद्ध गान में पिसते अरमान को ढूँढ रही थी शायद। लेकिन...