केश्वरवा की बीवी बहुते नाराज थी उससे। जाने कहाँ से एगो छौंड़ी के उठा लाया था केश्वरवा। पहिले तो सिंघवा वाली (केश्वर की बीवी ) बहुत रोई धोई। दू बार तो हँसुआ लेके दौड़ी भी थी केश्वरवा की तरफ कि काटिये देंगे। लेकिन गरीबी के फटे आँचल में रह रहे विरहा टोली में ये आम बात थी। हर मरद दुगो- तीन गो मौगी रखता, दिन भर हाड तोड़ मजूरी करके शाम को ताड़ी पीता। और रात को बीवी के साथ मारपीट, गालीगलौज कर के सो जाता। वैसे किसी तरह सिंघवा वाली मान गयी थी लेकिन केश्वरवा की दोनों बीवीयों का चूल्हा अलग ही रहा। समय बीत रहा था और हालत भी बदल रहा था। अब केश्वरवा को मजूरी भी नहीं मिल पा रही थी। घर के दोनों चूल्हे बुझे ही रहते। संपत्ति के नाम पर एक छोटी सी बंजर जमीन की टुकड़ी थी। लेकिन उस पर खेती करने के लिए भी बैल चाहिए थे। आज केश्वरवा निर्णय कर चुका था की सिंघवा वाली का एकलौता चाँदी का बिछिया बेच देगा। लेकिन जैसे ही उसने जबरदस्ती करनी चाही उसकी छोटी बीवी बीच में आ गयी। "तुम्हे मेरी सौगंध जो तूने मेरी दीदी के गहने बेचे तो। " अपने लिए सौत का इतना स्नेह देख सिंघवा वाली रोने लगी। सब गिला शिकवा आंसुओं से न...
लघुकथा अपने आप में एक सम्पूर्ण कथा होती है। इसे गागर में सागर कहें या फिर "देखन में छोटन लगे - घाव करे गंभीर " कहा जा सकता है।