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मई, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

तालाब की सीमा

गाँव में नया तालाब खुदा था। लोगों ने आरती की, पूजा किया, उत्सव मनाया। फिर एक दिन बाढ़ आ गयी। गाँव के बाहर बहने वाली नदी उछल उछल कर अपना विस्तार करने लगी। तालाब और नदी का पानी मिल गया। तालाब ने सोचा उसका विस्तार हो रहा है। नदी के आवेग से उसमे भी उफान आने लगा था। अब तालाब भी लोगों को भयभीत करने लगा था। पर कुछ दिनों बाद बाढ़ का पानी उतर गया। नदी तो यूँही बहे जा रही थी लेकिन तालाब में एक स्थिरता आ गयी थी। शायद उसे अपनी सीमा का एहसास हो चला था।

काश तुम इस सवाल का जवाब हाँ में देते

"कैसे हो तुम ?" "अच्छा हूँ। तुम सुनाओ।" "मेरी याद तो नहीं आती होगी?" "न कभी नहीं..." "सचमुच कभी याद नहीं आती ?" "न कभी नहीं..." "काश तुम इस सवाल का जवाब हाँ में देते। मैं सुकून से जी लेती अपनी जिंदगी।"

यू टर्न

"अच्छा ठीक है मेरी गलती थी जो मैने तुम्हे आई लव यू कहा... बचपना था मेरा। माफ़ कर दो मुझे और भूल जाओ मुझे " "हहहहह। …ज़ाओ तुम गिल्टी कंसस मत होओ। पर अब तो मेरी यही राह है और मेरे लिए कोई यू टर्न भी नहीं है।"

समझौता

" अच्छा अगर नहीं चाहते हो मुझे तो क्यों आते हो रोज़ मेरे पास ?" नया पेग बनाते हुए वो बोला :  " तुम इस शराब की तरह हो। मैं शराब से नफरत करता हूँ। लेकिन इसे छोड़ नहीं सकता। लत लग गयी है इसकी मुझे। " "अच्छा जानते हो मैं क्यों नही रोकती तुम्हे आने से ???" "क्यूँ ??" "क्यूंकि मैं भी तुम्हे शराब की तरह ही मानती हूँ। पर गटक सिर्फ इसलिए रही हूँ ताकि इस नशे में किसी और का नशा भुला सकूँ। " दोनों की कहकहे की आवाज गूँज उठी।

दौड़

बहुत सी सीढ़िया रखी थी। उनमे से एक सीढ़ी को चुनना था सब को। सब ने अपनी सीढ़ी चुन ली और चढ़ने लगे उस पर। कुछ तो सरपट भाग रहे थे। कुछ को ऊपर चढ़े लोग हाथ पकड़ कर खींच ले रहे थे। सुबह चढ़ना शुरू किया जब सब ने तो किसी ने नीचे मुड़ के नहीं देखा। बस सब एक दूसरे को देख रहे थे। कौन कहा है , कितना नीचे , कितना ऊपर है। अब जब शाम होने को को हुयी तो सब ने नीचे देखा। सीढ़ी का जड़ लुप्त था। लोग सोच में पड़ गए। पूरा दिन उस सीढ़ी के पायदानों को फांदने में लगा दिया था। कुछ शाम ढलने से पहले ही नीचे धड़ाम हो गए। बाकी शाम होते ही सारी सीढ़ियां गायब हो गयी। अगले सुबह फिर से ये दौड़ शुरू हो गयी। हाँ अब चेहरे नए थे।

मै, मेरी जिंदगी और सिगरेट

आज शाम से ही बड़ी सुगबुगाहट थी मन में । सालों बाद आज उससे मिलन होना था । लगभग एक दशक का अफेयर था उसके साथ । फिर हमारा ब्रेकअप हो गया था । घर वाले, समाज के लोग, इस्ट मित्र सभी कहते थे कि भाई ये तेरा जीवन बर्बाद कर देगी । छोड़ दे इसे । फिर शादी हो गयी मेरी और मैंने उससे बिल्कुल मुँह फेर लिया था । हाँ कभी कभी तन्हाई में उसकी याद जरूर आती थी । ठंढ की रात हो या कहीं सफर करते समय तो अक्सर उसकी याद आ जाती थी । पर मैं इमानदार था अपने बीबी के प्रति और नहीं चाहता था कि उसे कुछ पता चले और बुरा मान जाये । तो फाइनली आज जब बीबी मायके गयी हुयी थी और इस एकांत से घर में मेरे पास उसके अलावा कोई नहीं था । मैनें उसे होठों से लगा लिया । लगा जैसे पुराने दिन याद आ गये हों । माचिस निकाली और जला दिया उसे । आज सालों बाद मेरी कभी बेहद प्यारी रही सिगरेट मेरे हाथ में थी । फिर पहला कश लेते ही सब कुछ याद आने लगा। पहली बार जब सिगरेट पी थी तो कुछ एैसी ही मिचलाहट सी हुयी थी । दो कश लिया तो भावविभोर हो गया । काॅलेज के दिन, हास्टेल के दिन सब याद आने लगे । मैंने अजीब सा मुँह बनाके छल्ला बनाने की कोशिश भी की । अचानक...

दो पहलू

चिड़ियों की चहचाहट और उन्मुक्त उडान देख लग रह था मानो आसमान भी संतरंगी हो गया है। दिल तो किया कि काश चिडिया ही बनाया होता भगवान ने।  तभी दूर से आवाज आई धाँय - धाँय।  चहचाहट और बढ़ गयी। लेकिन अब इसमें एक कर्कशता थी। उड़ान उन्मुक्त न होकर भययुक्त लगने लगा। चिड़िया बनने का भाव अब दया भाव मे बदलने लगा था। आसमान रंगीन न होकर स्याह दिखने लगा।  मैं मौन हो कर इस भावनात्मक परिवर्तन को देख रहा था। तभी पीछे से आवाज आई... " यार मुकुल वो देख चिड़ियां के झुण्ड को। कितनी स्वछन्द उड़ती है आसमां मे । लगता है सतरंगी ख़्वाबों को उड़ायें जा रहीं है। " मैं मन ही मन बोला " शायद इसने धाँय - धाँय की आवाज नही सुनीं। "

निशब्द

"सुना है आजकल कोई आ गयी है तुम्हारी जिंदगी में। सच में क्या ?"  उसके इस प्रश्न मे जिज्ञासा कम और कटाक्ष अधिक लगी मुझे। "तो क्या करता। कब तक तुम्हारा इन्तेजार करता। और वैसे भी अब तो तुम किसी और की परिणीता    हो। तुम्हे क्यों ये सब जानना है ?" मुस्कुरा कर जवाब देने कि कोशिश कि मैने। लेकिन चेहरे पर  वेदना की हलकी सी उभरी रेखा को देख लिय था उसने। कुछ क्षण के लिये दोनो मौन थे। फिर उसने हौले से पूछा " अच्छा उसके साथ भी गंगा के किनारे नरम घास पर घंटो बैठ लहरो को निहारते हो, साँझ ढले चुपके से छत पर आ के घंटो आसमां के रंगीन झिलमिल तारों मे खो जाते हो। उसके संग भी...." अब एक कटु मुस्कान आ गयी थी मेरे चेहरे  पर " ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह। ये सब उसे पसंद नही। उसे तो मॉल में, मल्टीप्लेक्स मे और डिस्क मे ही मेरे साथ टाइम स्पेंड करने मे मज़ा आता है। " "और तुम्हे ?????" अब मैं निशब्द था। मौन ने फिर से आँचल पसार लिया था।