सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

मार्च, 2016 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

प्रतिच्छाया

"आओ गुड्डू हम एक गेम खेलते हैं। वो देखो पापा कैसे हाथ उठा के चिल्ला रहे हैं। तुम न पापा की तरह चिल्लाओ और मैं मम्मी की तरह दोनों हाथ ऐसे करके चिल्लाऊंगी। " नन्ही परी अपने टैडी "गुड्डू "को दरवाजे पर बन रहे प्रतिच्छाया को देखकर समझा रही थी। अगले दिन नास्ते की टेबल पर परी पापा से बोली :  " पापा आप मेरा एक छोटा सा काम कर दोगे। " "बोलो बेटा " बड़े दुलार से पूछा पापा ने। "आप मेरे टैडी को लड़ना सीखा दोगे। वैसे जैसे आप और मम्मी लड़ते हैं। मैं न मम्मी की तरह तो कर लेती हूँ पर ये गुड्डू आपकी तरह कर नहीं पाता है। कल से ही सीखा रही हूँ इसे पर ये सीखता ही नहीं। " पापा अवाक् थे। पीछे खड़ी माँ के भी पैर के नीचे से जमीन खिसक गयी थी। अगली रात से वो  प्रतिच्छाया कभी नजर नहीं आई।

बुजुर्ग कदम - युवा मन

सालों बाद मिले थे देवकुमार और मीनल । विदेश में दशकों रहने के बाद जब मीनल वापस अपने शहर आयी तो अचानक देव से मुलाकात हो गयी । वही देव जो उसके प्रेम का देव था कभी, किन्तु दोनों के माँ बाप ने उन्हें मिलने ना दिया था । आज भी वो देव को नहीं पहचान पाती लेकिन मीनल की आँखें तो देव कभी भूला ही नहीं था । देखते ही पहचान गया । कुछ देर हाल चाल  होने के बाद; "चलो अपने पुराने अड्डे पर चलते हैं। जानती हो वहां एक कॉफी शॉप खुल गया है। " "अरे पर बच्चे घर में इंतजार कर रहे होंगे। " "अरे छोडो भी बच्चे भी तो अब बड़े हो गए हैं। अच्छा चलो फ़ोन कर लो। " "मुद्दत बाद मिले हो लेकिन बदले बिलकुल नहीं। पर थोड़े बुड्ढ़े हो गए हो। " "और तुम ?" "मैं तो अभी भी वैसी ही हूँ, स्वीट सिक्सटीन। हाहाहाहा। " "अरे ! धीरे बोलो कोई सुनेगा तो क्या कहेगा बुड्ढे बुड्ढी पागल हो गए हैं। अच्छा तुम्हारा परमेश्वर कैसा है ?" "कौन परमेश्वर ?" "अरे पति परमेश्वर " "हाहाहा ! तुम भी न पोते पोती हो गये पर सुधरे नहीं हो " "याद है आखिरी...

शोभा

हवेली के बाहर का पेड़ हवेली की शोभा बिगाड़ रहा था। मालिक ने उसे कटवा दिया।  कुछ दिनों बाद भूकम्प में हवेली धराशायी हो गयी। प्रकृति ने अपनी शोभा बिगाड़ रही हवेली को कटवा दिया था।