"आओ गुड्डू हम एक गेम खेलते हैं। वो देखो पापा कैसे हाथ उठा के चिल्ला रहे हैं। तुम न पापा की तरह चिल्लाओ और मैं मम्मी की तरह दोनों हाथ ऐसे करके चिल्लाऊंगी। " नन्ही परी अपने टैडी "गुड्डू "को दरवाजे पर बन रहे प्रतिच्छाया को देखकर समझा रही थी। अगले दिन नास्ते की टेबल पर परी पापा से बोली : " पापा आप मेरा एक छोटा सा काम कर दोगे। " "बोलो बेटा " बड़े दुलार से पूछा पापा ने। "आप मेरे टैडी को लड़ना सीखा दोगे। वैसे जैसे आप और मम्मी लड़ते हैं। मैं न मम्मी की तरह तो कर लेती हूँ पर ये गुड्डू आपकी तरह कर नहीं पाता है। कल से ही सीखा रही हूँ इसे पर ये सीखता ही नहीं। " पापा अवाक् थे। पीछे खड़ी माँ के भी पैर के नीचे से जमीन खिसक गयी थी। अगली रात से वो प्रतिच्छाया कभी नजर नहीं आई।
लघुकथा अपने आप में एक सम्पूर्ण कथा होती है। इसे गागर में सागर कहें या फिर "देखन में छोटन लगे - घाव करे गंभीर " कहा जा सकता है।