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अगस्त, 2013 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

परिवर्तन

भाग रहा था वो, हाथो में नुकीला हथियार लिए , निशाना साधा और दे मारा। अचूक निशाने और उसके भुजबल के समक्ष वो हिरण शावक अपनी जिन्दगी हार चुका था। पशु से मनुष्य के परिवर्तन के बीच गायब हुई पाशविकता एक अग्निज्वाला  की तरह प्रकट हुई जो शिकारी के  अट्टहास और हिरन की दर्दनाक चीख को अपने में समाये जा रही थी। छटपटाहट  अपने चरम पर थी। धीरे धीरे हिरण  शावक  का शरीर शिथिल पड़ गया। शिकारी  अपने नुकीले दांतों से फाड़ने लगा उसके मांस को। धीरे धीरे उसके अन्दर आनंद भरने लगा.. इसी मस्ती में वो मांसहीन  हड्डियों के सुराख से आवाजें निकालने लगा। लेकिन ये क्या, बेसुरी आवाज अचनक सुरीली होते होते दर्दनाक होने लगी। शायद कोई अदृस्य शक्ति रही होगी, वो  रुकना चाह रहा था लेकिन  वो बजाता रहा। हड्डी  से बांसुरी सी धुन निकलने लगी। बहती  हवा ने इस धुन में अजीब सी थिरकन ला दी। पहली बार श्रृष्टि इस अद्भुत दृश्य को देख रहा था। अचनक हिरण शावाक की आँखें दिखी उसे। प्राण पखेरू निकल...

पंखुड़ी जमीन पर

ऋतुराज के आने से सब कुछ बदल सा गया था। अक्सर छुपा रहने वाला सूरज अपनी नरमी बिखेर रहा था.। शीतल मलय इसके संपर्क में आके थोड़ी सी उष्ण हो चुकी थी.।  भ्रमर पुष्पपरागपान से उन्मत्त हो कर स्वरलाहिरी बिखेर रहे थे.। पुष्प अपना पराग लुटा कर  भी अति मनहर प्रतीत हो रहे थे । सब कुछ इतना मनोरम था जैसे श्रृष्टि अपनी यौवनावस्था में फिर से प्रवेश कर गयी हो। लेकिन इन सबके बीच में उपवन में बैठा देवपुरुष  सदृश  नवयुवक की दृष्टि  कही अटक सी गयी थी...एक गुलाब के पुष्प पर । निस्संदेह उस वाटिका का सबसे सुन्दर पुष्प  था वो । पुष्प को देख युवक मुग्ध सा हो गया था। लेकिन धीरे धीरे एक अकुलाहट सी आ गयी उसके मन में । मोहपाश में बंधकर वो पास आ गया उस पुष्प के. . अकुलाहट और बढ़ गयी ...स्पर्शातुर हाथ बढ़ गये उस पुष्प की ओर, अब अकुलाहट अपने चरम पर थी...उन्मत्त सा हो गया था युवक । जाने क्या हुआ उसने तोड़ दिया उस पुष्प को । अचानक एक मर्मभेदी आह सी निकली.... भ्रमरों का गान कर्कश हो गया ...सूर्य कुछ शर्मसार सा हो के बादलों में छुपने लगा....हवा में भी एक पैन...

१५ अगस्त को स्कूल बंद है

"पापा मैं इस बार भगत सिंह बनने वाला हूँ ,स्कूल में जो इंडिपेंडेंस डे फंक्शन होगा उसमे। आप बस मेरे लिए एक हथकड़ी और पगड़ी ला दो" "ओके बेटा ला दूँगा ...पर बेटा १५ अगस्त तो परसों है, कल ला दूँगा।" "नहीं पापा ,परसों स्कूल बंद है, कल ही फंक्शन होगा।" "पर बेटा परसों तो झंडा फ़हराया जाएगा ना स्कूल में … तो स्कूल बंद कैसे हो सकती है " "ये सब मुझे नहीं पता … आप आज ही ला दो जो मैंने कहा है बस।  बच्चा कहते कहते निकल गया कमरे से … लेकिन  १५ अगस्त को आजकल स्कूल बंद रहता है ये सरकारी स्कूल में पढ़े पापा के दिमाग में घुस नहीं रहा था.।

बेस्ट ग्रोथ रेट

प्रज्वल्लित चिताग्नि में स्वाहा हो रही थी कई दिन से जल रही जठराग्नि। मांस के जलने की गंध मिल रही थी खदान से आ रही कोयले के गंध से। सारा जीवन कोयले की खान में मजूरी करते करते उसके जिस्म में भी कोयले की गंध घुस गयी थी। पूरा जिस्म जलकर धुंआ हो चुका था, केवल कटे हुए उसके पैर पर कुछ मांस बचे थे जो चील कौए एक हफ्ते से खाने की कोशिश में लगे थे। । इसी धुएं में कुछ गाडियों के धुंए भी मिल रहे थे। मुख्यमंत्री अपने काफिले संग लौट रहे थे अवार्ड लेकर बेस्ट ग्रोथ रेट का।

इकबाल

ये जिजीविषा ही थी जिसने एक पांच वक़्त के नमाजी को हिन्दू बनने पर मजबूर कर दिया। दो ही रास्ते थे या तो हिन्दू बन जाओ या फिर पुरुखों की इस मिटटी में अपने अपने तमाम यादो को दफ़न कर पाकिस्तान चले जाओ। यूँ तो वो न ही अपने  मकान को  बचा सके, न ही अपने परिवार को  और ना ही अपने उस  गाँव को । जालिमों ने सरहद पार के जुल्म का बदला उनके छोटे से गाँव को जला कर ले लिया था. अपने बेजान से जिस्म को बचाकर किसी तरह दिल्ली ले आये। नाम तो वही था बस उपनाम बदल लिया था उन्होंने इकबाल मोहम्मद से इकबाल चंद हो गये. जिस घर में ठहरे थे उसी घर की एक बाल विधवा से विवाह कर फिर से परिवार बसा लिया।पहले के सच को एक कुरान शरीफ के साथ बंद कर एक बक्से में रख दिया।आज जब आखिरी साँसे गिन रहे थे उनसे रहा नहीं गया . बेटे से वो छोटा बक्सा मंगवाया जो सबके लिए कौतुहल का विषय था लेकिन आज तक जिसके बारे में किसी को कुछ नहीं पता था। कांपते हाथों से चुचाप  उसमे से कुरान शरीफ निकाला। पहले आँखों में फिर सर पे लगाया । पूरे शरीर में एक कम्पन सी हुई फिर आँखें बंद हो गयी...

लेकिन बेटा ये जश्न ना मनाया जाता है हमसे

बात उन दिनों की है जब मैं पंजाब में अपने इंजीनियरिंग के पहले वर्ष में था ..दिन १५ अगस्त का था ...लेकिन बहुत अजीब लग रहा था ...सुबह सुबह चाय पीने कैंटीन पंहुचा तो जगतार सिंह जी दिख गये ...८० साल का सरदार..लेकिन अभी भी दुरुस्त दिखते थे ... "चाचा मुझे तो लगता ही नही की आज १५ अगुस्त है ..कही कोई उत्साह ही नही दिख रहा ...हमारे यहाँ तो सुबह से लाउडस्पीकर पर देशभक्ति के गाने बजने लगते ...प्रभात फेरी झंडोत्तोलन और ...मुझे तो लगता ही नहीं की ये वही पंजाब है जिसने सबसे ज्यादा देशभक्त पैदा किये हैं ..भगत सिंह , लाला लाजपत राय..." कुछ देर चुचाप सुनने के बाद वो बोले:- "ओये पुत्तर , जिस आजादी के लिए अपने लाल कुर्बान किये इस पंजाब ने उसी आजादी ने इस पंजाब के दो टुकड़े कर दिए ...अपने ही घर में इधर से उधर भगाया गया लोगों को ... मार, काट, बलात्कार ...और ८४ का वो दंगा उसके भी बीज तो इसी आजादी ने ही डाले थे... देश के लिए आज भी जान देने की बारी आये तो सबसे आगे पंजाबी ही होंगे ...लेकिन बेटा ये जश्न ना मनाया जाता है हमसे ..." कहते कहते अजीब सा चेहरा हो गया था उनका...!!!