भाग रहा था वो, हाथो में नुकीला हथियार लिए , निशाना साधा और दे मारा। अचूक निशाने और उसके भुजबल के समक्ष वो हिरण शावक अपनी जिन्दगी हार चुका था। पशु से मनुष्य के परिवर्तन के बीच गायब हुई पाशविकता एक अग्निज्वाला की तरह प्रकट हुई जो शिकारी के अट्टहास और हिरन की दर्दनाक चीख को अपने में समाये जा रही थी। छटपटाहट अपने चरम पर थी। धीरे धीरे हिरण शावक का शरीर शिथिल पड़ गया। शिकारी अपने नुकीले दांतों से फाड़ने लगा उसके मांस को। धीरे धीरे उसके अन्दर आनंद भरने लगा.. इसी मस्ती में वो मांसहीन हड्डियों के सुराख से आवाजें निकालने लगा। लेकिन ये क्या, बेसुरी आवाज अचनक सुरीली होते होते दर्दनाक होने लगी। शायद कोई अदृस्य शक्ति रही होगी, वो रुकना चाह रहा था लेकिन वो बजाता रहा। हड्डी से बांसुरी सी धुन निकलने लगी। बहती हवा ने इस धुन में अजीब सी थिरकन ला दी। पहली बार श्रृष्टि इस अद्भुत दृश्य को देख रहा था। अचनक हिरण शावाक की आँखें दिखी उसे। प्राण पखेरू निकल...
लघुकथा अपने आप में एक सम्पूर्ण कथा होती है। इसे गागर में सागर कहें या फिर "देखन में छोटन लगे - घाव करे गंभीर " कहा जा सकता है।