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जून, 2013 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

वैसे भी जीते तो हम अपने बच्चों के लिए ही हैं

4 महीने ही तो बचे हैं नौकरी के.. वैसे भी ६० के होने वाले है.. जिंदगी में सब कुछ मिला, घर परिवार , सम्मानित नौकरी स्कूल हेडमास्टर की…. बस चिंता है एकलौता बेटे की, कहीं नौकरी मिल जाती तो भविष्य बन जाता , वैसे भी चैन से तभी मर सकता हूँ जब लगेगा की उसका भविष्य सुरक्षित है ... सुना है अगर नौकरी में रहते मर जाऊ तो अनुकम्पा पर नौकरी मिल जाती है बेटे को...इससे अच्छी मौत क्या हो सकती है....वैसे भी जीते तो हम अपने बच्चों के लिए ही हैं...

उलझन

बीच आँगन में लाश रखा गया है । सब बिन्नी को हौसला दे रहे हैं । आखिर उसके पिता के देहांत के बाद इसी चाचा ने आसरा दिया था उसे और उसकी माँ को। लेकिन बिन्नी  बिलकुल खामोश है , कही अतीत में खोई हुई। "अरे बेटी क्या हुआ भैया नही रहे तो ,मुझे अपना पापा समझो .." कहते कहते सीने से लगा लिया था। एक अजीब सा अपनापन लगा था उसे ।लेकिन समय के साथ साथ ये आशीष भरा आलिंगन चुभने लगा था।चाचा का इधर उधर स्पर्श करना उस समय तो नही लेकिन बड़ी होने पर समझने लगी थी बिन्नी। आज सामने उसी चाचा की लाश है और अजीब सी उलझन में है बिन्नी । समझ नही पा रही है की समाज द्वारा देवता घोषित  चाचा के लाश पर फूट फूट  कर रोये या फिर इस घिनौने  पापी के लाश को खींच कर एक थप्पड़  दे।

डूग डूग डुग ....डूग डूग डुग ...

डूग डूग डुग ....डूग डूग डुग ... ये आवाज सुनते ही  तीर की तरह लपकते हुए हम  बाहर पहुँच जाते थे ... "ऐ सुखिया एगो २ टकिया बरफ दे ना " "पहिले  कल वाला पैसा मलकिनी से मांग के दीजिये " "अरे धीरे बोलो माँ सुनेगी तो मारेगी " "देखिये हम ऐसे फीरी में बरफ नहीं बांटते  है…जाईये आज नहीं मिलेगा ..." पांच मिनट तक मिन्नत करने के बाद ... भारी क़दमों से जब  वापस जाने लगते तो .. पीछे से हर बार की तरह आवाज सुनाई  देती थी, "आईये ...लेकिनि आखिरी बार ही दे रहे हैं ...कल से उधार नहीं मिलेगा ..." आज भी जब किसी आइस  क्रीम पार्लर में जाता हूँ सोचता हूँ कही से सुखीया के डमरू की आवाज आएगी शायद ... डूग डूग डुग ....डूग डूग डुग ...

कम से कम उस कृष्ण की तरह अपनी राधा को तो नही भूलोगे ना

"देखो अगर कृष्ण को आराध्य मानती हो तो राधा की तरह प्रेम करो, रुक्मिणी तो बस रानी मात्र थी ...कृष्ण का प्रेम तो राधा के लिए ही था ... " "लेकिन मैंने तो तुम्हे पुरुषोत्तम माना है....मुझे तो सीता बनना है ...सास-ससुर हो, दो पुत्र हो ... पति इतना प्रेम करे की मेरे लिए महाबली लंकेश से भी युद्ध कर ले..."    "लेकिन सीता तो विवाह से पहले राम से मिली भी नही थी....." . . . "चलो कोई बात नही, कम से कम उस कृष्ण की तरह अपनी राधा को तो नही भूलोगे ना..."  "अरे नहीं बाबा ..अब फ़ोन रखो भी ...होने वाली बीबी का फ़ोन आ रहा है ...और तुम तो समझती ही हो ...."