लडखडाती चाल, मुँह से आती बास, उबली हुई लाल लाल आँखें ...धुत्त था बिलकुल वो ...अभी अभी गालियों की लम्बी बौछाड़ मार के सुस्ता रहा था ... "क्या देख रहे हो उधर साहब झुग्गियों के लिए आम बात है ये ..." "लेकिन यार लगता ही नही की ये भी दिल्ली ही है...." "अरे छोडो साहब, ये बताओ माल (चरस) कितने का चाहिए ..." "४०० का दे दे…" "साहब, आप लोगों के हाई सोसाइटी में भी तो ये सब होता है ना ...उधर डिफेंस कॉलोनी में मैं काम किया १० साल ...लेकिन साहेब उधर ठीक है ...घर बड़ा होता है न ...सब कुछ अन्दर ही दब जाता है ...बाहर कुछ नहीं आता ...यहाँ बेचारे एक कमरे के घर में पूरी फैमिली....किधर को चिल्लाएगा ...बड़े लोग सब काम सलीके से करते हैं ....है ना साहेब ...." "अच्छा अच्छा अब तू मूड ख़राब मत कर ....माल दे, भाषण मत पेल ...."
लघुकथा अपने आप में एक सम्पूर्ण कथा होती है। इसे गागर में सागर कहें या फिर "देखन में छोटन लगे - घाव करे गंभीर " कहा जा सकता है।