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सफ़ेद पन्नो का इन्तेजार

डायरी नयी थी। सभी पन्ने सफ़ेद थे। अजीब सी गंध थी उस डायरी की। लेकिन सभी पन्नों में एक सी। फिर एक दिन डायरी के कुछ पन्नो पर स्याही बिखरने लगा। पलटते पन्नो के साथ ही शेष बचे श्वेत पन्ने इंतज़ार करने लगे उस स्याही का। पर लेखक ने आधी डायरी लिख कर छोड़ दिया लिखना। जाने क्या हुआ उसके साथ। आजकल रोज नए नए हाथो से डायरी के पन्ने पलटने लगे हैं । लेकिन सिर्फ वही जिनपे स्याही बिखरी है। सफ़ेद पन्नों को आज भी इंतजार है खुद की कहानी सुनाने का।

दो बैल

केश्वरवा की बीवी बहुते नाराज थी उससे। जाने कहाँ से एगो छौंड़ी के उठा लाया था केश्वरवा। पहिले तो सिंघवा वाली (केश्वर की बीवी ) बहुत रोई धोई। दू बार तो हँसुआ लेके दौड़ी भी थी केश्वरवा की तरफ कि काटिये देंगे। लेकिन गरीबी के फटे आँचल में रह रहे विरहा टोली में ये आम बात थी। हर मरद दुगो- तीन गो मौगी रखता, दिन भर हाड तोड़ मजूरी करके शाम को ताड़ी पीता। और रात को बीवी के साथ मारपीट, गालीगलौज कर के सो जाता। वैसे किसी तरह सिंघवा वाली मान गयी थी लेकिन केश्वरवा की दोनों बीवीयों का चूल्हा अलग ही रहा। समय बीत रहा था और हालत भी बदल रहा था। अब केश्वरवा को मजूरी भी नहीं मिल पा रही थी। घर के दोनों चूल्हे बुझे ही रहते। संपत्ति के नाम पर एक छोटी सी बंजर जमीन की टुकड़ी थी। लेकिन उस पर खेती करने के लिए भी बैल चाहिए थे। आज केश्वरवा निर्णय कर चुका था की सिंघवा वाली का एकलौता चाँदी का बिछिया बेच देगा। लेकिन जैसे ही उसने जबरदस्ती करनी चाही उसकी छोटी बीवी बीच में आ गयी। "तुम्हे मेरी सौगंध जो तूने मेरी दीदी के गहने बेचे तो। " अपने लिए सौत का इतना स्नेह देख सिंघवा वाली रोने लगी। सब गिला शिकवा आंसुओं से न...

स्वच्छता अभियान

"अरे सुनो, इस कूड़े के डब्बे में से साफ़ सुथरा टाइप का कूड़ा निकाल के इधर रखो... हाँ ठीक है अब इसे उठा लो और इधर फैला दो... अरे पुन्नू देख तो मीडिया वाला सब आ गया न... झाड़ू थोड़ा ट्रेडिशनल लाओ भाई... ओके लाइट, कैमरा एक्शन। " नेता जी ने खुद उठाया झाड़ू ... जैसा की आप देख सकते हैं ....ब्ला ब्ला ब्ला !! "

नायक

भीड़ के साथ ही जा रहा था वो। आसमानी नारे लगाते हुए। भीड़ बढ़ती ही जा रही थी। उसके नारों में एक  जोश था। लोग उसके दीवाने होने लगे। जाने कब भीड़ ने उसे रास्ता दे कर आगे खड़ा कर दिया। वो भी मतवाला बढे जा रहा था। अचानक उसने एक नजर भीड़ पर दौड़ायी। उसे लगा जैसे गंगोत्री की संकीर्ण स्वच्छ गंगा, विशालकाय गंदे सागर में बदल गयी हो। उसे एहसास हुआ की नियत अभी भी स्वच्छ है पर शायद दिशा गलत है। उसने दिशा बदली। अब वो भीड़ के उलटी दिशा में था। फिर हुआ यूँ की  उन्मादी भीड़ अपने पूर्व भीड़ नायक को कुचल कर निकल गयी।

आत्मसमर्पण

उन औरतों के अदम्य साहस और क्षमता को एक दिशा देकर नक्सली क्रांति की पट्टी पढाई गयी थी। जुल्म की दास्ताँ कानों में भर भर कर खड़ा किया गया था तथाकथित मुख्यधारा के खिलाफ। अगणित साथियों के क्षत- विक्षत लाश और बलात्कार से नुचे जिस्मों को देख भी विचलित नहीं हुयी थी वो अपनी राह से। लेकिन आज जाने क्या था उन गाँव की छोरियों के नाच में। रंग - बिरंगी तितली की भांति लहराती, बाहों में बाहें डाल डोलती लड़कियों को देख कर मन के कोने मे कुछ पिघलने लगा था। कंधे पर टंगे राइफल और गोलियों का भार अब असह्य सा लगने लगा था। सुबह अख़बार के मुख्य पृष्ठ पर कुछ नक्सलियों के आत्मसमर्पण की खबर थी।

आखिरी प्रेम सन्देश

"अक्सर लगता था कही दूर मुझे कोई आवाज दे रहा है। सुदूर किसी रेगिस्तान में, किसी पहाड़ी पर देवदार के झुरमुट से, दूर बहती नदी के उस ओर से जहाँ वो क्षितिज से जुड़ती है। पर जब तुम्हे देखा लगा वो आवाजे तुम्हारे ही इन गुलाब पंखुरी सदृश अधरों से निकली हुयी हो। ये प्रेम है या क्या है पता नहीं पर अब जब तुम चली गयी हो वो, आवाजें फिर से आने लगी हैं।" लिखते लिखते रुक गया अचानक से। ctrl+a और shift+delete दबा दिया। एक बार फिर से आखिरी प्रेम सन्देश अधूरा छूट गया... अधूरे प्रेम की तरह।

राजनीती

भैया जी दबंग ही नहीं थे ४ बार सांसद और दुइ बार मंत्री भी रह चुके थे। ऐसे तो भैया जी के लिए सब बराबर था। का हरिजन और का बामन। लेकिन ससुरा परमेशरा को तो अपना हरिजन का राजनीति करना था। तो भड़का दिया लोगन को " देखो अपना लोग ही समझ पायेगा हमरी पीड़ा को। पिछलग्गू बनना छोड़ के आगे लाओ अप्पन बिरादरी वाले को।" अब भैया जी को अपने हाथ से क्षेत्र और इज्जत दुनु निकलते दिख रहा था। तो ख़तम कर दिए ससुरा को। खुदे गोली मारे थे उहो दू बित्ता से मात्र। अब भैय्या जी को तो हो गयी जेल लेकिन विरासत सँभ ालने आ पहुंचा उनका विलायती बेटा। एकदम भैय्या जी का ट्रू कॉपी लगता है और दिमाग देखिये बबुआ का चुनाव परचार के लिए सबसे पाहिले परमेशरे के घर गया। ओकर बूढ़उ बाप के पैर धर के बोला " बाबूजी को फंसाया गया है अरे इ सब राजनीती है आप के बेटा को मरवा दिया और हम्मर बाप को फंसा दिया.. अब बाप जैसे हैं आप हम्मर...अब हमहि को परमेशर मानिये।" अब जो बेचारा जिनगी भर अप्पन छाँही को भी छुपा लेता था अइसन बड़का लोगन से एकदम से पसीज गया। "अरे कुंवर जी पाप न चढ़ाई हमके। हमर मन नहीं मानत है कि मालिक इ बूढ़ा के आँख छीन स...

एकहि साधे सब सधे, सब साधे सब जाय।

विद्यालय से शिक्षा पूर्ण करने जा रहे छात्रों में से शिक्षक ने दो सर्वश्रेष्ठ छात्रों को एकांत में बुलाया।  " तुम दोनों विज्ञानं , गणित, कला सब कुछ में अव्वल आते रहे हो। भविष्य में तुम किस विषय के साथ आगे बढ़ना चाहोगे। " पहले ने कहा " गुरु जी , मैं हर क्षेत्र में सफल होना चाहता हूँ। " दूसरे ने कहा " गुरु जी मैं विज्ञान अथवा कला में से एक को साधना चाहता हूँ। " गुरु जी ने दो पर्ची बनायीं और दोनों को थमा दिया।  दुसरे की पर्ची में लिखा था " यशस्वी भवः। सफलता तुम्हारे कदम चूमेगी " पहले की पर्ची में लिखा था " एकहि साधे सब सधे... सब साधे सब जाय। "

रात की कहानी

शाम की किरणों ने अंदाजा लगाया था की रात की कहानी रोचक होगी। भोर होते ही किरणें दौड़ पड़ी उस ओर। खिड़की के अधखुले पल्ले से, परदे की ओट से निकल कर पहुंच गयी बिस्तर पर। बिस्तर  की सिलवटें बता रही थी रात कुछ ख़्वाबों ने जन्म लिया है। फिर किरणें कुछ आगे बढ़ी। तकिया दिखा गीला सा। शायद कुछ खब्बों का क़त्ल भी हुआ था। 

कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन्

पसीने की बूँद कान के ऊपरी हिस्से से होते हुए गर्दन के नीचे फिसल रही थी। धूल की एक हलकी परत जम गयी थी चेहरे पर। घर आते ही बंद हो गया बाथरूम में। शावर से निकले पानी में धूल, पसीने की बदबू में लिपटा कुछ अरमान, दर्द के साथ बहने लगा। फ्रेश होकर बैडरूम में आया। सामने दीवार पर टंगे पोस्टर में लिखा चमक रहा था... "कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन् । "

औरत की इज्जत बनाम भैंस की चोरी

आदत से लाचार था। इंसान नहीं जानवर था। शायद जानवर से भी बदतर। औरत की इज्जत जैसे शब्द उसे समझ में ही नहीं आते थे। ३-३ रेप और १० से अधिक मामले सिर्फ छेड़खानी के दर्ज थे उसके नाम। पर किस्मत का धनी था। पुलिस और क़ानून उसे छू भी ना पाती थी या शायद छूना नहीं चाहती थी। लेकिन एक दिन किस्मत ने धोखा दे दिया । उसने एक भैंस चुराई और गलती से वो भैंस माननीय मंत्री जी की निकल आई। अब रेप मर्डर करता तो बात अलग थी पर मंत्री जी की भैंस खोलना माने सिस्टम को चुनौती देना था। सड़ रहा है आजकल वो जेल में।

तालाब की सीमा

गाँव में नया तालाब खुदा था। लोगों ने आरती की, पूजा किया, उत्सव मनाया। फिर एक दिन बाढ़ आ गयी। गाँव के बाहर बहने वाली नदी उछल उछल कर अपना विस्तार करने लगी। तालाब और नदी का पानी मिल गया। तालाब ने सोचा उसका विस्तार हो रहा है। नदी के आवेग से उसमे भी उफान आने लगा था। अब तालाब भी लोगों को भयभीत करने लगा था। पर कुछ दिनों बाद बाढ़ का पानी उतर गया। नदी तो यूँही बहे जा रही थी लेकिन तालाब में एक स्थिरता आ गयी थी। शायद उसे अपनी सीमा का एहसास हो चला था।

काश तुम इस सवाल का जवाब हाँ में देते

"कैसे हो तुम ?" "अच्छा हूँ। तुम सुनाओ।" "मेरी याद तो नहीं आती होगी?" "न कभी नहीं..." "सचमुच कभी याद नहीं आती ?" "न कभी नहीं..." "काश तुम इस सवाल का जवाब हाँ में देते। मैं सुकून से जी लेती अपनी जिंदगी।"

यू टर्न

"अच्छा ठीक है मेरी गलती थी जो मैने तुम्हे आई लव यू कहा... बचपना था मेरा। माफ़ कर दो मुझे और भूल जाओ मुझे " "हहहहह। …ज़ाओ तुम गिल्टी कंसस मत होओ। पर अब तो मेरी यही राह है और मेरे लिए कोई यू टर्न भी नहीं है।"

समझौता

" अच्छा अगर नहीं चाहते हो मुझे तो क्यों आते हो रोज़ मेरे पास ?" नया पेग बनाते हुए वो बोला :  " तुम इस शराब की तरह हो। मैं शराब से नफरत करता हूँ। लेकिन इसे छोड़ नहीं सकता। लत लग गयी है इसकी मुझे। " "अच्छा जानते हो मैं क्यों नही रोकती तुम्हे आने से ???" "क्यूँ ??" "क्यूंकि मैं भी तुम्हे शराब की तरह ही मानती हूँ। पर गटक सिर्फ इसलिए रही हूँ ताकि इस नशे में किसी और का नशा भुला सकूँ। " दोनों की कहकहे की आवाज गूँज उठी।

दौड़

बहुत सी सीढ़िया रखी थी। उनमे से एक सीढ़ी को चुनना था सब को। सब ने अपनी सीढ़ी चुन ली और चढ़ने लगे उस पर। कुछ तो सरपट भाग रहे थे। कुछ को ऊपर चढ़े लोग हाथ पकड़ कर खींच ले रहे थे। सुबह चढ़ना शुरू किया जब सब ने तो किसी ने नीचे मुड़ के नहीं देखा। बस सब एक दूसरे को देख रहे थे। कौन कहा है , कितना नीचे , कितना ऊपर है। अब जब शाम होने को को हुयी तो सब ने नीचे देखा। सीढ़ी का जड़ लुप्त था। लोग सोच में पड़ गए। पूरा दिन उस सीढ़ी के पायदानों को फांदने में लगा दिया था। कुछ शाम ढलने से पहले ही नीचे धड़ाम हो गए। बाकी शाम होते ही सारी सीढ़ियां गायब हो गयी। अगले सुबह फिर से ये दौड़ शुरू हो गयी। हाँ अब चेहरे नए थे।

मै, मेरी जिंदगी और सिगरेट

आज शाम से ही बड़ी सुगबुगाहट थी मन में । सालों बाद आज उससे मिलन होना था । लगभग एक दशक का अफेयर था उसके साथ । फिर हमारा ब्रेकअप हो गया था । घर वाले, समाज के लोग, इस्ट मित्र सभी कहते थे कि भाई ये तेरा जीवन बर्बाद कर देगी । छोड़ दे इसे । फिर शादी हो गयी मेरी और मैंने उससे बिल्कुल मुँह फेर लिया था । हाँ कभी कभी तन्हाई में उसकी याद जरूर आती थी । ठंढ की रात हो या कहीं सफर करते समय तो अक्सर उसकी याद आ जाती थी । पर मैं इमानदार था अपने बीबी के प्रति और नहीं चाहता था कि उसे कुछ पता चले और बुरा मान जाये । तो फाइनली आज जब बीबी मायके गयी हुयी थी और इस एकांत से घर में मेरे पास उसके अलावा कोई नहीं था । मैनें उसे होठों से लगा लिया । लगा जैसे पुराने दिन याद आ गये हों । माचिस निकाली और जला दिया उसे । आज सालों बाद मेरी कभी बेहद प्यारी रही सिगरेट मेरे हाथ में थी । फिर पहला कश लेते ही सब कुछ याद आने लगा। पहली बार जब सिगरेट पी थी तो कुछ एैसी ही मिचलाहट सी हुयी थी । दो कश लिया तो भावविभोर हो गया । काॅलेज के दिन, हास्टेल के दिन सब याद आने लगे । मैंने अजीब सा मुँह बनाके छल्ला बनाने की कोशिश भी की । अचानक...

दो पहलू

चिड़ियों की चहचाहट और उन्मुक्त उडान देख लग रह था मानो आसमान भी संतरंगी हो गया है। दिल तो किया कि काश चिडिया ही बनाया होता भगवान ने।  तभी दूर से आवाज आई धाँय - धाँय।  चहचाहट और बढ़ गयी। लेकिन अब इसमें एक कर्कशता थी। उड़ान उन्मुक्त न होकर भययुक्त लगने लगा। चिड़िया बनने का भाव अब दया भाव मे बदलने लगा था। आसमान रंगीन न होकर स्याह दिखने लगा।  मैं मौन हो कर इस भावनात्मक परिवर्तन को देख रहा था। तभी पीछे से आवाज आई... " यार मुकुल वो देख चिड़ियां के झुण्ड को। कितनी स्वछन्द उड़ती है आसमां मे । लगता है सतरंगी ख़्वाबों को उड़ायें जा रहीं है। " मैं मन ही मन बोला " शायद इसने धाँय - धाँय की आवाज नही सुनीं। "

निशब्द

"सुना है आजकल कोई आ गयी है तुम्हारी जिंदगी में। सच में क्या ?"  उसके इस प्रश्न मे जिज्ञासा कम और कटाक्ष अधिक लगी मुझे। "तो क्या करता। कब तक तुम्हारा इन्तेजार करता। और वैसे भी अब तो तुम किसी और की परिणीता    हो। तुम्हे क्यों ये सब जानना है ?" मुस्कुरा कर जवाब देने कि कोशिश कि मैने। लेकिन चेहरे पर  वेदना की हलकी सी उभरी रेखा को देख लिय था उसने। कुछ क्षण के लिये दोनो मौन थे। फिर उसने हौले से पूछा " अच्छा उसके साथ भी गंगा के किनारे नरम घास पर घंटो बैठ लहरो को निहारते हो, साँझ ढले चुपके से छत पर आ के घंटो आसमां के रंगीन झिलमिल तारों मे खो जाते हो। उसके संग भी...." अब एक कटु मुस्कान आ गयी थी मेरे चेहरे  पर " ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह। ये सब उसे पसंद नही। उसे तो मॉल में, मल्टीप्लेक्स मे और डिस्क मे ही मेरे साथ टाइम स्पेंड करने मे मज़ा आता है। " "और तुम्हे ?????" अब मैं निशब्द था। मौन ने फिर से आँचल पसार लिया था।

अमेरिकन अच्छे होते हैं... है ना ?

बस के अगले सीट पर बैठी बच्ची अपने पापा को बाहर घूम रहे सूअरों को दिखाने की कोशिश कर रही थी।  "पापा वो देखो पिग..."  " पर पापा ये तो गंदे हैं। बुक्स में तो पिग बड़े क्यूट होते हैं " पापा चुप ही रहे, लेकिन साथ में बैठी मम्मी ने समझाते हुए कहा :  " बेटे वो अमेरिकन पिग्स होते हैं। और ये इंडियन पिग है। " " मम्मा, अमेरिकन अच्छे होते हैं... है ना ? " बच्ची ने तपाक से कंक्लूजन निकाल लिया। मैं अवाक् रह गया.... मम्मी का ज्ञान सुनकर या शायद बच्ची का कंक्लूजन सुनकर।

पुष्प की अभिलाषा

पतझड़  में बिखरा हर फूल अपने में एक दास्ताँ समेटे था। भ्रमरों का दल जो कभी मधुमास में उन्मुक्त  रहता था पुष्प पराग पान में। अचानक से बदलते मौसम के साथ गिरते पुष्पों को देख गायब हो चला था। पुष्पों कि अभिलाषा ना तो यहाँ सुरबाला के गहनों में गूंथने कि थी , ना तो  देवो के सिर पर चढ़ने की और ना ही उस पथ पर गिरने की जहाँ से देश प्रेमी वीर गुजरते हों। पुष्प की अभिलाषा थी एक आखिरी मिलन की उन अगणित भ्रमरों से जिसने उसके अस्तित्व को सुवासित किया था। 

घुलते बदलते रंग

नौकरी की मजबूरी और स्वजनों से दूरी ने इस होली को बेरंग बना दिया था। बालकनी में चुपचाप सिगरेट के कश पे कश लगाये जा रहा था वो। तभी सामने एक टोली दिखी ४-५ लड़कियों की। उन्मुक्त भाव से एक दूसरे को रंग लगाती, ठहाके मारती। अचानक से एक खुशी कि तरंग दौड़ गयी उसके अंदर। गौर से देखने लगा वो चेहरे पे पुते हरे, लाल, पीले, नीले , गुलाबी रंग। धीरे धीरे गाढ़े होते जा रहे रंगो में उतरने लगा वो। फिर उसने देखा की इन रंगों से स्नेह और प्रेम की एक अदृस्य सी धारा निकल रही है जो समाहित कर रही है अनंत काल से चली आ रही अवधारणाएं जिसने औरतों का शोषण किया है । अचानक उसने महसूस किया कि रंग के कुछ छींटें उसके ऊपर भी आ गिरे हैं।  

फल अगर मौसम से पहले पक जाए तो फिर मीठा नहीं हो पाता है

" इतनी कड़वे-कसैले क्यूँ हो नीम कि तरह। बसंत तो वृद्धों में भी यौवन ला देता है और तुम युवा होके भी हर मौसम पतझड़ सा महसूस करते हो।"  "जानते हो कोई फल अगर मौसम से पहले पक जाए तो फिर मीठा नहीं हो पाता है। खट्टा ही रहता है।" "ओह्ह तो फिर से वही पुरानी घिसी पिटी प्रेम कहानी। अरे मान क्यूँ नहीं लेते वो बचपना था तुम्हारा। अरे तुम तो बादशाह ए चमन हो सकते हो और उलझे हो एक कली में। " "जानते हो जब भूख शांत हो जाती है तो छप्पन भोग भी आकर्षित नहीं कर पाता है। और ये तो रूहानी भूख है। इसे सिर्फ वही शांत कर सकता है जो … रहने दो तुम नहीं समझ सकते "

फेक प्रोफाइल

दो दिन से एक अजीब से अकाउंट से मेसेज आ रहा रहा था। मेसेज नहीं पढ़ा मैंने बस नाम देखा। एंजेल लव ऐसा ही कुछ नाम था। अरे इसी अकाउंट से तो फ्रेंड रिक्वेस्ट भी आया था.. मैं बुदबुदाया  " साले लोगों को क्या हो गया है। नाम लिखने में शर्म आती है। जरूर किसी लौंडे का फेक प्रोफाइल होगा। यार पता नहीं क्या मजा आता है लोगों को इसमें " कुछ देर बाद एक फ़ोन आया  "अबे सुमि ने तुम्हारा नंबर माँगा है। कॉल किया था उसने या नहीं ? बोल रही थी एफ बी पर तो जवाब ही नहीं देता है । अबे रिप्लाई कर दियो और हाँ एंजेल लव के नाम से प्रोफाइल है उसका " अचानक ही एक मुस्कान तैर गयी चेहरे पर

काश कोई अच्छा बहाना ढूंढा होता

काश कोई अच्छा बहाना ढूंढा होता ब्रेक उप के लिए। जानती हो तुम्हारे हाथ से खाये मोमोस का स्वाद आज तक नहीं ढूंढ़ पाया मैं , तुम्हारे हाथो से पिया वो वोडका विथ गुआवा जूस का स्वाद आजतक नहीं मिला किसी पेग में, तुम्हारे साथ बिताये हर लम्हे कि कहानी आजतक लिखता रहता हूँ लेकिन ना मैं थकता हूँ न ही मेरी लेखनी। काश ब्रेक उप का अच्छा बहाना ढूंढा होता तुमने जिससे मैं सच मान पाता और शुमार कर लेता अपनी प्रेम कहानी को अमर प्रेम कथा में। काश।

दो गला

"ऐ नेता जी एगो बात बताईये जरा सा भी शर्म नहीं आता है पार्टी बदले में। उहे गला से जिंदाबाद जिंदाबाद बोलते बोलते अचानके से मुर्दाबाद मुर्दाबाद कैसे बोल लेते हैं। दो गला तो नहीं है कहीं आपके पास। " "देखो बौआ का है कि अब जनते मूड बदल लेती है तो हमको भी तो फॉलो करना पड़ेगा ना जी। हैं तो आखिर जनता का सेवक ही न।"

कहानी हर बिन्नी की

चहकती मचलती बिन्नी... पापा की लाड़ली बिन्नी.. भैया की आन बिन्नी... घर की शान बिन्नी और शादी के बाद जब आयी तो बनके मेहमान बिन्नी....! (कहानी हर बिन्नी/औरत की..)

जब तक पेट ना भरी होगी आँचल में ढूध ना भर पायेगा

कोयले के पत्थर पर हथोड़े चलाते हुए उसे ऐसा लग रहा था मानो अपने निष्ठुर नियति की कालिमा को वो चीरने का प्रयत्न कर रही हो। सर से टपके पसीने कि बूँद उसके कान के पिछले हिस्से से होती हुयी पीठ पर पहुंच एक झुंझलाहट भर रही थी उसके अंदर। सोचा इतने कष्ट को सहने से अच्छा है छुधा कि पीड़ा को ही सह ले लेकिन तभी आँखें अटक गयी अपने अबोध बच्चे पर। और याद आ गयी अम्मा कि वो बात " जब तक पेट ना भरी होगी आँचल में ढूध ना भर पायेगा " और जाने कहाँ से एक अजीब साहस आ गया उसके अंदर। दोगुने रफ़्तार से हथोड़ा चलाने लगी वो पत्थरों पर।

हाँ रद्दी ही तो है ये

बाहर रद्दी वाला आवाज लगा रहा है "मैडम जल्दी करो कुछ रद्दी कागज़ है तो। " हाथ में फिर से वही खतों का बण्डल, आँख में वही खारा पानी। पूरे ३४० ख़त और ख़त में लिखी एक एक बातें ...ऐसा लगने लगा जैसे " वो " खुद यहाँ अपने ख़त को पढ़ के सुना रहा है।  रद्दी शब्द से चौंक उठी वो। एक एक पल उसके प्रेम में बिताया रद्दी कैसे हो सकता है। लड़खड़ाते हुए उठी वो रद्दी वाले के सामने आयी। तौलने लगा उस बण्डल को रद्दी वाला। अचानक से वो बण्डल उठा लिया उसने अपने अंकुश में... सीने से लगा के चीख उठी... "रद्दी नहीं है ये। रद्दी नहीं है हो सकता है ये । " लेकिन तभी उसके सामने पति और बच्चे का चेहरा नाचने लगा। बरबस ही उसके मुह से आवाज आयी  " हाँ रद्दी ही तो है ये ".....

किस्मत

रोज़ सब वे पर बैठा हुआ दिखता है वो बुड्ढा। फटे हुए चद्दर में खुद को किसी तरह ढँकता हुआ। आने जाने वाले हर एक की तरफ कातर निगाह से देखता है। कुछ बड़बड़ाता है। भगवन भला करेगा बेटा.. मैं इतना ही सुन पाता हूँ। दिल्ली कि सर्दी अपना क्रूरतम रूप दिखा रही है। मोटे कम्बल के नीचे सपने भी अच्छे आते हैं। लेकिन कल सपने में वही बुड्ढ़ा नजर आया। सुबह ही सोच लिया था कि पुराना कम्बल उसे दे आउंगा। सुबह उठते ही कम्बल को पैक किया। सबवे के पास मेरी निगाह उसे ढूंढने लगी। लेकिन ये क्या आज वो भिखारी नजर नहीं आया। मैं थोड़ी दूर भटका, लेकिन वो नदारद था। मैं ऑफिस के लिए लेट हो रहा था। अपना कम्बल उठाया और दूर बस स्टॉप पर बैठे एक भिखारी को दे आया। अगले दिन सबवे पर फिर से वही भिखारी नजर आ गया। ठंढ से ठिठुरता खुद को एक चादर में छुपाते हुए। अब मुझे किस्मत पे यकीन होने लगा था।