भीड़ के साथ ही जा रहा था वो। आसमानी नारे लगाते हुए। भीड़ बढ़ती ही जा रही थी। उसके नारों में एक जोश था। लोग उसके दीवाने होने लगे। जाने कब भीड़ ने उसे रास्ता दे कर आगे खड़ा कर दिया। वो भी मतवाला बढे जा रहा था। अचानक उसने एक नजर भीड़ पर दौड़ायी। उसे लगा जैसे गंगोत्री की संकीर्ण स्वच्छ गंगा, विशालकाय गंदे सागर में बदल गयी हो। उसे एहसास हुआ की नियत अभी भी स्वच्छ है पर शायद दिशा गलत है। उसने दिशा बदली। अब वो भीड़ के उलटी दिशा में था। फिर हुआ यूँ की उन्मादी भीड़ अपने पूर्व भीड़ नायक को कुचल कर निकल गयी।
" आज -कल वो गुरु-शिष्य परंपरा नहीं रही "- कहते हुए डॉ रमनन ने सिगरेट सुलगाई ... अब छात्रों से वो इज्जत कहा मिलती है teachers को ....! '' Sir Time has changed ..अब छात्र विद्या अर्जन करने नहीं बल्कि खरीदने आते हैं " " Yes Mohit - खैर मुझे क्या करना है इन बातों का .....Forget those things ...अब ये teachers का जो खम्भा बचा है उसे भी तो ख़तम करना है .... " मोहित आज्ञाकारी छात्र की तरह तन्मयता से गुरु आज्ञा पालन में लग गया ........
