"अक्सर लगता था कही दूर मुझे कोई आवाज दे रहा है। सुदूर किसी रेगिस्तान में, किसी पहाड़ी पर देवदार के झुरमुट से, दूर बहती नदी के उस ओर से जहाँ वो क्षितिज से जुड़ती है। पर जब तुम्हे देखा लगा वो आवाजे तुम्हारे ही इन गुलाब पंखुरी सदृश अधरों से निकली हुयी हो। ये प्रेम है या क्या है पता नहीं पर अब जब तुम चली गयी हो वो, आवाजें फिर से आने लगी हैं।"
लिखते लिखते रुक गया अचानक से। ctrl+a और shift+delete दबा दिया। एक बार फिर से आखिरी प्रेम सन्देश अधूरा छूट गया... अधूरे प्रेम की तरह।
