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सितंबर, 2013 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कल आओगे न फिर से

अस्ताचलगामी सूरज को देख कर मन उदासी से भरने लगा था। ग्रीष्म का सूरज दिन भर कितना दर्द दिया था, कितनी ताप थी उसकी किरणों में। लेकिन जाते जाते कितना गंभीर लग रहा था और कितना लाल। शायद अपने किये पर शर्मिंदा था। ज्यों ज्यों दूर हो रहा था, नजरों में और विशाल लगने लगा था। झुलसे बदन की बैचेनी, विरह की कल्पनामात्र से गायब हो गयी थी।  जोर से पूछ बैठी "कल आओगे न फिर से" ।

जब जब बदली घिर जाती है

"अरे क्या कर रही हो भींग जाओगी ..." "आओ न तुम भी..." "अरे नहीं नहीं भींग जाऊंगा.. खुद तो बीमार पडोगी मुझे भी बीमार कर दोगी.." "कितने डरते हो तुम अच्छा एक मिनट हाथ देना मैं भी ऊपर आ जाऊ ..." "ये लो अरे खींच क्यूँ रही हो  ओहो  ये क्या किया तुमने देखो भींग गया मैं भी .." "हाहाहा तो क्या क्या हुआ वैसे भी कागज़ के तो हो नहीं ..वैसे सच बताओ लग रहा है न अच्छा ? " ह्म्म्म… मैंने सर हिला  दिया एक मुस्कान के साथ और कस  के भींच लिया उसे अपनी बाहों में । सालों बीत गये इस बात के लेकिन आज भी जब जब बदली घिर जाती है , बारिश की पहली बूँद जब कभी मेरे तन छू जाती है तो एक पगली सी लड़की की याद मुझे आ जाती है.। 

कुत्ते से सावधान

एक मंत्री जी को सबसे इमानदार नेता का अवार्ड दिया गया क्यूंकि उन्होंने अपने बंगले के बाहर लिखवाया था "कुत्ते से सावधान"...!

चुप चाप उठ के चल पड़ा वो अपनी मूर्ति को संभाले

धक् धक् धक् धक्। ट्रेन की तरह दिल धड़क रहा था। आज एक दशक बाद उसे देखने वाला था। मिलन के बाद विरह और विरह के बाद फिर से मिलन। प्रेम की सम्पूर्णता का एहसास उसके दिल को रोमांचित कर रहा था मिलन के दिन यूँ तो बमुश्किल १० ही थे लेकिन एक एक दिन की गाथा में महाकाव्य रचा जा सकता था। उसके बाद के हिज्र के दिनों में  बस दर्द और वियोग की भावनाओं का पराकाष्ठा था। प्रेम जीवन के रात्रि समान इन काले वर्षो में एक मात्र उससे मिलने की उम्मीद की रौशनी ने उसे जीवित रख्खा था। मन आँगन में उसकी जमी हुयी मूर्ति को रोज़ याद रूपी सुनहले पोछे से वो चमकाया करता था.। तभी दूर से आती हुयी दिखी वो। अब तो धड़कन शताब्दी की रफ़्तार पकड़ चुकी थी। लेकिन ज्यों ज्यों वो पास आने लगी। उसके मांग की सिंदूर और गले का मंगलसूत्र बिलकुल स्पष्ठ दिखने लगा.।  धड़कन अब मंथर हो गयी थी। सिन्दूर का रंग चुभने लगा उसे, रंग और गाढ़ा हो चला था। मांग में फैला सिंदूर उसे अपने चारो ओर उड़ता हुआ दिखने लगा था। मन में छाये इस सिन्दूरी बवंडर में प्रेम कही खोने लगा था। खुद को सम्भाला उसने।गौर से देखन...

हम ठहरे समाजवादी

मंत्री साहब अपने बंगले से निकलने वाले ही थे की ..श्रीमती जी आ गयीं..   "अजी सुनते है ...आप भी चलिए न हमरे साथ रामलला के दर्शन करने ..." "पागल हो गयी है क्या ...इलेक्शन सर पे है और हम ठहरे समाजवादी...अगर कही अख़बार में फोटो -वोटो आ गया तो माइनॉरिटी वोट तो गया हाथ से ...अरे चलना ही है तो शिव मंदिर चलो, कृष्ण मन्दिर चलो...इ अयोध्या जाना है तो हम साथ नही जा सकते बस...."