"साहब, 10,000 से कम नहीं लूँगी.. " उस औरत ने आखिरी बार कहा। "अरे चल भाई ! आगे 6,000 में मिल जायेगी... " साहेब ने ड्राइवर से कहा। "पक्का साहब ? " ड्राइवर ने अनमने ढंग से पूछा । "हाँ भाई ! चल सीसा चढ़ा आगे चल ।" गाड़ी जैसे ही वहाँ से निकली । साहब ने तुरंत ही गाड़ी रूकवायी । "क्या हुआ साहेब ?" "अबे तू रूक जा यहीं, मैं 6,000 में बात करके आ रहा हूँ ।" साहब वापस आ गये थे उस औरत के पास । "ये ले 10,000..." "क्या साहब, पैसे तो सुबह भी दे सकते थे ।" मुस्कुरायी वो । "सुन आज तू रेस्ट कर जाके .." बोल के साहेब निकल लिये । गाड़ी के पास पहुँचे तो ड्राइवर बोला : " क्या हुआ साहेब ? " " अबे चल सही माल नहीं थी। " ड्राईवर अब दिल्ली के पाॅश एरिया में गाड़ी भगा रहा था और सोच रहा था साहेब भी पता नहीं कैसा कंजर है, रोज इधर से गुजरता है और पैसे को लेकर ऐसा ही नाटक करता है । साहेब के चेहरे पर संतुष्टि का भाव था । वहाँ पीछे 10,000 लिये वो औरत सन्न सी खड़ी थी । रात खुद-ब-खुद उजाले की ओ...
लघुकथा अपने आप में एक सम्पूर्ण कथा होती है। इसे गागर में सागर कहें या फिर "देखन में छोटन लगे - घाव करे गंभीर " कहा जा सकता है।