रोज़ सब वे पर बैठा हुआ दिखता है वो बुड्ढा। फटे हुए चद्दर में खुद को किसी तरह ढँकता हुआ। आने जाने वाले हर एक की तरफ कातर निगाह से देखता है। कुछ बड़बड़ाता है। भगवन भला करेगा बेटा.. मैं इतना ही सुन पाता हूँ। दिल्ली कि सर्दी अपना क्रूरतम रूप दिखा रही है। मोटे कम्बल के नीचे सपने भी अच्छे आते हैं। लेकिन कल सपने में वही बुड्ढ़ा नजर आया। सुबह ही सोच लिया था कि पुराना कम्बल उसे दे आउंगा। सुबह उठते ही कम्बल को पैक किया। सबवे के पास मेरी निगाह उसे ढूंढने लगी। लेकिन ये क्या आज वो भिखारी नजर नहीं आया। मैं थोड़ी दूर भटका, लेकिन वो नदारद था। मैं ऑफिस के लिए लेट हो रहा था। अपना कम्बल उठाया और दूर बस स्टॉप पर बैठे एक भिखारी को दे आया। अगले दिन सबवे पर फिर से वही भिखारी नजर आ गया। ठंढ से ठिठुरता खुद को एक चादर में छुपाते हुए। अब मुझे किस्मत पे यकीन होने लगा था।
लघुकथा अपने आप में एक सम्पूर्ण कथा होती है। इसे गागर में सागर कहें या फिर "देखन में छोटन लगे - घाव करे गंभीर " कहा जा सकता है।