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मूर्तिकार

मूर्तिकार की व्यस्तता बता रही थी की दुर्गा पूजा काफी नजदीक आ चुकी है। महिषासुर और माता की अनेकों मूर्तियाँ विभिन्न आकर और रूपों में पड़ी थी। लेकिन एक मूर्ति कुछ ज्यादा ही भव्य बनके उभर रही थी। मूर्तिकार भी इधर उधर मिटटी चढ़ा के उसे और सुन्दर बनाने में लगा था। बीच बीच में आत्म मुग्ध होकर काफी देर तक निहारता भी रहता उस मूर्ति को।  रात हो चुकी थी। दिन भर के थकान को भूल अपनी ही धुन में लगा पड़ा था। जाने कब नींद आ गयी उसे। अचानक सपने में उसे वही मूर्ति मुस्कुराती नजर आई। सम्मोहित सा  खड़ा रहा वो। मूर्ति की मुस्कान और भी गहरी हो गयी। एक विचित्र सी आभा फैलने लगी चहुओर। घंटियों और शंखों की आवाज आने लगी ,अगरबत्ती और धूप का धुंआ जैसे फ़ैल गया था। फिर अचानक एक सैलाब आया पानी का। वो मूर्ती अब डूब रही थी, उसके रंग पानी में घुलने लगे थे। घंटियों और शंखों की आवाज और तेज़ हो गयी थी। देखते ही देखते मूर्ती गायब हो गयी। मूर्तिकार सपने में रोने लगा। फिर उसे लगा कोई उसके आंसू पोछ रहा है। गौर से देखा , अरे ये तो माँ है....जगत जननी नहीं बल्कि उसकी जननी।

रिश्तों की बैलेंस शीट

"अब हम इस रिश्ते को यहीं खत्म करते हैं" "क्यों ? कोई और मिल गई क्या ?" "नहीं । बस अब आत्मग्लानि सी होती है " "मेरे साथ सोने में तो नहीं हुई थी तुम्हें " "बकवास मत करो " "ओह ! तो उस बकवास का क्या..जो करके तुमने मुझे बरबाद कर दिया ।" "वो प्यार था मेरा ।" "तो वही कह रही मैं भी कि अब प्यार कहाँ गया " "तुमने अपने पति से क्यों मिलवाया मुझे?" "ये मेरे सवाल का जबाव नहीं है " "अगर ना मिलवाती तो मुझे उससे दोस्ती न होती । और अब वो दोस्त है तो मैं उसके साथ गद्दारी नहीं कर सकता " "तुम बात गोल गोल मत घुमाओ । मैं बस इतना जानती हूँ कि मेरा पति मेरे उपर समाज की थोपी गलती है और मैं बस तुमसे प्यार करती हूँ ।" "सुनो अगर मुझसे प्यार करती हो तो एक मदद करोगी " "हम्म्म् " "रिश्ते को रीओरगेनाइज करते हैं । हम तुम दोस्ती निभाते हैं और पति से तुम प्यार वाला रिश्ता निभा लो ।" "काश ये इतना आसान होता जैसे तुमने कह दिया। सी ऐ बाबू ये रिश्ते हैं आपका...

बदबू

"हमारा पति पत्नी का रिश्ता भले ही ना टूटे पर तुम्हे मैं चूम नहीं सकती " खामोश निगाहों ने ऐसे देखा मानो पूछ रहा हो क्यों ... "क्यूंकि तुम्हे चूमते हुए मुझे लगता है तुम्हारे साँसों से उस चुड़ैल की बदबू आ रही है " खामोश निगाहों में कसैलापन के साथ साथ कुछ शर्मिंदगी भर गयी थी। 

क से कहानी

एक गरीब टाइप वृद्ध को अखबार पढ़ते देख लेखक का मन उद्वेलित हो गया । सोचने लगा पूछ लूँ कुछ इनसे, क्या पता कुछ कहानी ही हाथ लग जाये । "बाबा क्या पढ़ रहे अखबार में ?" "वही जो लिख्खा है इसमें " अनमने ढंग से जवाब आया । लेखक चुप हो गया सुन कर। सोचा अड़ियल है बुढ़ढा । कबर में पैर है, गरीबी की चादर तले बैठा है, लेकिन अकड़ नहीं जा रही । पर कोई नहीं ; फोटो ले लेता हूँ इसकी । दर्द भरी कहानी तो बहुत सी बन जाएगी । अब लेखक कहानी सोचने लगा " पुत्र द्वारा प्रताड़ित पिता...राजनीति के गिरते स्तर को देखता एक सच्चा समाजसेवी... "बंद हुए चीनी मिल" के संबंध में खबर पढ़ता हुआ एक वृद्ध जो इसके बंद होने से बेरोजगार हो गया था ...पेपर में अपना नाम और फोटो ढूंढ़ता वृद्ध... रोजगार वाले कॉलम में अपने बेटे के लिए नौकरी ढूंढता वृद्ध....ब्ला ब्ला ब्ला। तभी बुजुर्ग की आवाज आई : "का टकटकी लगाये हो.. पेपर पढ़ना है। ये लो। वैसे भी मोहल्ले में सब मुफ्त का ही पेपर पढता है। एक मेरा मनोहरवा ही गधा है जो पेपर खरीद कर पढता है।" लेखक साहब सन्न थे। दिमाग भनभना रहा था। पेपर हा...

बैकवार्ड

कोई बैकवार्ड ना समझ ले इसलिए दोस्तों के सामने माँ को "माॅम" बुला रहा था मोहित ।  तभी उसका पैर फिसला । गिरते गिरते चिल्ला उठा " आ गे मैय्या गे मैय्या " ।

खैरात

ये लेडीज सीट है, सुनते ही बैठे नवयुवक खड़े हो गये । एक युवती तो बैठ गयी लेकिन दूसरी खड़ी ही रही । "सुमी, अब बैठ भी जा " "मैं नहीं बैठ रही ।" "क्या हुआ तुझे ?" "यार लीव इट ना । वैसे भी खैरात की चीजें पसंद नहीं मुझे ।" "क्या खैरात ? ये हमारा हक है ।" "ये हक मुझे नहीं चाहिये, वैसे भी मैं किसी लड़के से कम हूँ क्या " "तू नहीं सुधरने वाली " दोनों के चेहरे पर मुस्कुराहट तैर गयी ।

बुनियाद

"एक आखिरी सवाल, साधन का अभाव होते हुए भी आप इतने सफल हुए जीवन में ।  कोई एक वजह बता सकते हैं ? " " मेरी बुनियाद मजबूत थी " "समझा नहीं ?" "मेरी माँ, एक मजबूत महिला थी। "

श्रद्धा या सहूलियत

"देख यार उधर पैर करके नहीं सोते हैं। उधर भगवान की फोटो है।" "भगवान की फोटो तो तेरे लैपटॉप में भी है, फिर साले तू गन्दी वीडिओज़ क्यों देखता है ?" "यार, देख तू अपने अटपटे लॉजिक को मेरे श्रद्धा और विश्वास के बीच मत लाया कर।" "हाहाहा...श्रद्धा है या सहूलियत ? खैर जाने दे।"

रामपुर वाली

"ये कौन थी मम्मी ?" "रामपुर वाली काकी " "रामपुर वाली इनका नाम है ?" "नहीं बेटे रामपुर इनका मायका है इसलिए सब इन्हें रामपुर वाली बुलाते हैं " "पर इनका नाम क्या है मम्मा ??" "पता नहीं । अब छोड़ो भी, जाके होमवर्क करो।" सवाल तो टाल गई वो पर मन ही मन सोचने लगी "कैसे समझाउँ कि गाँव की औरतों के नाम नहीं होते... और शहरों में ही कौन सा होता है। वहाँ फलानपुर वाली और यहाँ मिसेज फलाना " मन दुखी होने लगा तो टीवी आॅन कर दी। न्यूज फ्लैश हो रहा था " सानिया मिर्जा ने भारत को टेनिस में दिलायी एक और सफलता " आँखों में चमक आ गयी, लगा जैसे बदलाव बहुत नजदीक है ।

आरक्षण

'कुछ शरम करो जी..तुम हमेशा फर्स्ट आते थे क्लास में..और राममनोहरा तो टाॅप टेन में भी नहीं आता था। पर आज उ बैंक मनेजर बने वाला है और तुम जुत्ता घिस रहे हो ।" "बाबू जी । उस इग्जाम में भी हम राममनोहर से ज्यादा नंबर लाये थे । " "तो निकला काहे नहीं जी इग्जाम ?" "जैसे की आप जानते ही नहीं । काश हम भी जनरल में ना पैदा होके एस सी एस टी में पैदा होते । " "क्या बोले ??" "कुछ नै बाबू जी । तैय्यारी करते हैं , इस बार पक्का निकाल लेंगे ।"

बरसात

दो दिन पहले ही गेटकीपर बोल रहा था " अब का बताएँ सर..गरमी इतनी है कि सो नहीं पाते हैं रात को.." मुझे याद आ गया बचपन में कहीं पढ़ा था " गरमी गरीबों की, सर्दी अमीरों का .." लगा जैसे शहरी गरीब की परिकल्पना ही नहीं की होगी लेखक ने उस समय। अब तो "गरमी और सर्दी दोनों ही अमीरों का है।" फिर मन में ख्याल आया बारिश हो जाए तो सब के लिए भला होगा। अमीरो का एयरकंडीशन का बिल बचेगा। और गरीब बेचारे सुकून से सो पाएंगे रात में। खैर आज बारिश भी हुयी जम के। गेटकीपर बाबू लाल को देखते ही मैं पूछ बैढा " क्यों बाबू भैय्या । आज तो सोये होंगे अच्छी तरह। बारिश ने तो काफी राहत दिला दी है।" बाबू थोड़ी बेबसी में थोड़ी सी उग्रता मिलाकर बोला "कहाँ सर । रात भर झुग्गी चू रही थी सो अलग उपर से सुबह तक घर में नाले का पानी घुस आया था।" अब मैं क्या बोलता। थोड़ी बहुत सांत्वना दे के कट लिया वहाँ से। मन व्यथित हो गया था । लगा जैसे गर्मी और सर्दी की तरह बरसात भी अमीरों के लिए ही बनायीं गयी हो।

आप भी समझते नहीं हैं , हर बात पे दोनों बाप बेटा लड़ लेते हैं

"आप भी समझते नहीं हैं , हर बात पे दोनों बाप बेटा लड़ लेते हैं। " "अरे मैं कहा लड़ता हूँ।  मैं तो बस उससे कुछ देर बात करना चाहता हूँ। आखिर जिसके लिए अपनी पूरी जिंदगी लगा दी मैंने।  उससे दो मिनट बात भी नहीं कर सकता।" "पर आप तो जानते हैं ना आजकल के बच्चे।  माँ बाप का जरा सा भी हस्तक्षेप बर्दास्त नहीं कर पाते।" "बिट्टू की माँ याद है न, ऑफिस से थका हारा आता था फिर भी इसे रोज घुमाने ले जाता था शाम को।" "बिट्टू के पापा, एक बात कहूँ। बुरा तो नहीं मानोगे??" "बोलो " "याद है आप रोज बिट्टू को तो पार्क घुमाने ले जाते थे।  पर बिट्टू के दादा जी सुबह से आपका इन्तेजार कर रहे होते थे, और आपके पास समय नहीं होता था उनसे बात करने का। मानती हूँ आप गलत नहीं थे इसलिए ये भी मानती हूँ की बिट्टू भी गलत नहीं। " "नहीं बिट्टू की माँ। मैं गलत था और शायद बिट्टू भी है।" दोनों खामोश थे अब। 

कैसी हो। मुद्दत बाद याद आई मेरी

"कैसी हो। मुद्दत बाद याद आई मेरी। " "मैं ठीक हूँ। सुनो। दरअसल वो कॉल मैंने इसलिए किया था की..." "हाँ, हाँ ! बोलो... वैसे भी तुम्हारे कॉल का इन्तेजार करते करते अब तो बाल भी सफ़ेद होने...." "वो मेरी और तुम्हारी एक पिक है फेसबुक पर। वो प्लीज डिलीट कर देना। " "हम्म.. ओके। " "और बताओ …" "मैं थोड़ा बिजी हूँ..बाई.. "

तुम बना रही हो और हम बन रहे हैं

"तुम बना रही हो और हम बन रहे हैं " झुंझला के वो बोला । "हाहाहा । आखिर हैं ही इतने स्मार्ट हम " अदा से वो बोली । "हुँह्ह । इसमें तुम्हारा स्मार्टनेस नहीं है...हमारा मन है बस.." अकड़ के वो बोला । "वो भला क्यूँ ?" मुस्कुराकर आँखों में आँखें डाल वो बोली । " क्यूँकी कमबख्त मेरा मन भी अब मेरा नहीं रहा ।" चेहरे का नकली बेबसी का भाव हौले हौले प्यार के गहरे भाव में बदल रहा था ।

Facebook @ Vyang - Part 3

"भाई किसी को क्या दिया मैंने ये मत सोच ...तू बता तुझे क्या चाहिये ??" "जो उसे मिला ..." बोल के उँगली उठा दी इंसान ने फेसबूक न्यूजफीड की तरफ । भगवान ने उस ओर देखा सैकड़ो अलग अलग टाइप के इंसानों के अपडेट आ रहे थे ।  अब भगवान भी कनफ्यूजिया गये । बोले " मुन्ना कोई एक चीज ले ले ! जैसे म्यूजिसियन बना देता हूँ या कार दिला देता हूँ या फारेन ट्रिप.. एक्सेट्रा, एक्सेट्रा !" "एक चीज से काम नहीं बनता प्रभु । कम से कम इतना तो दे दो कि टाईमलाईन अच्छी हो जाये ।" "स्ट्रगलर ही रहियो जिंदगी भर ..." बड़बड़ाते हुये भगवान आॅफलाइन हो गये !! इंसान ने सोचा शायद भगवान का फेक अकाउंट रहा होगा । 2 मिनट बाद फिर से वो लग गया लाइक्स और स्माइली चेपने में ...;) :D

बंटवारा

लड़ाई मंदिर के चढ़ावे को ले कर थी। बंटवारे के तहत गजानन पंडित जी को कार्तिकेय की मूर्ति का चढ़ावा मिला था जबकि उनके भाई कार्तिक पंडित जी को गणपति का चढ़ावा। अब कार्तिकेय भगवान की मूर्ति पर चढ़ावा कम था गणपति के मूर्ति से, तो बात बिगड़ गयी। यहाँ तक की पंडो के बीच हाथापायी की नौबत आ गयी। बड़े पंडित शिव कुमार जी ने इसका उपाय निकाला। अपने हिस्से के शिव और पार्वती की मूर्तियों को दोनों में बाँट दिया। माँ-बाप को अलग अलग बेटो के हिस्से में डाल दिया। अब शिव जी की मूर्ति कार्तिकेय की मूर्ति के साथ और माँ गौरी की मूर्ति गणपति की मूर्ति के साथ थी।  खैर चढ़ावा तकरीबन बराबर ही आने लगा था दोनों भाईयों को। तो सभी खुश थे इस  बंटवारे  से। 

अंतर्द्वंद

बंटी ने अपनी माँ को किसी तरह अपने शराबी बाप से पीटने से बचा लिया था आज। "कैसे झेल गयी मम्मी तुम इस इंसान को इतने साल ! " " बेटे यही सोच कर की शायद ये ठीक हो जाएँ ! "

पुनर्निर्माण

जमीं की जकड़न कम हो रही थी। उसे दुनिया से जोड़ने वाली जड़ें काटी जा रही थी। दुखों ने निष्ठुर बना दिया था जमीं को। अब उसे दुनिया के जीव पराये लगने लगे थे। फिर एक जलजला आया। सृष्टि की सारी रचना एक अवस्था में आ चुकी थी। एक विशाल दलदल की चादर फ़ैल गयी थी जमीन के ऊपर। जैसे अनेक धातुओं को पिघला कर एक साथ फैला दिया गया हो। किन्तु सारी रचनाओं को नष्ट कर सृष्टि नीरस हो चुकी थी। कुछ दिनों बाद दूर कही जमीं में हलचल हुयी। एक पौधा जमीन के सीने पर जनम ले रही थी। सृष्टि अपने पुनर्निर्माण में फिर से लग गयी थी।

आज फिर आई थी वो सपने में

आज फिर आई थी वो सपने में। पर काफी बदली बदली लग रही थी इस बार। चेहरा थोड़ा उदास लग रहा था। ना कुछ बोली, ना कुछ चेहरे के भाव बदली। "क्या हुआ तुम्हे ?" "कुछ नहीं। वो आजकल कितनी गर्मी बढ़ गयी है। रेड़ी वाले सड़को पर कैसे काम करते हैं ? रिक्शे वाले इस तपती दुपहरी में कैसे सवारी ढोते हैं। वो आइसक्रीम वाला छोटा सा बच्चा कैसे पसीने बहाते दोपहर में ठंढी आइसक्रीम बेचता है ? " अब मैं परेशान हो गया। "अरे तुम तो मेरी तरह सोचने लगी। पर कैसे ? पहले तो तुम्हे मेरी इन बातों से चिढ होती थी। " "वो क्या है ना। आजकल हम सपने में ही मिलते हैं ना। तो मैं भी तुम्हारे सपनो जैसे होती जा रही हूँ। तुम्हारी तरह ही सोचने लगी हूँ। 

ठुल्ला

"देखो जी मैं तो कहती हूँ रिश्ता पक्का कर लेना चाहिए। अब ट्रैफिक हवलदार है लड़का। सैलरी से कई गुना ज्यादा तो ऊपर की कमाई होगी। अरे कहाँ ध्यान है आपका?? कुछ बोल रही हूँ मैं आपसे... " " ओह्ह सॉरी। हाँ बोलो क्या बोल रही थी तुम ? " "छोड़ो ये सब। पहले ये बताओ आपको आने में आज देर कैसे हो गयी??" "वो रेड लाइट से गाडी निकाल रहा था कि "ठुल्ला" आ गया। अब खाली सड़क देख मैंने लाल बत्ती तोड़ भी दी तो क्या हुआ। पर वो स्साला "माम्मा" कंजर निकला। 500 भी ले गया और खाली पीली में टाइम भी बर्बाद कर  दिया। अच्छा छोडो इन बातों को वो क्या कह रही थी तुम ?" " कुछ नहीं जी...बाद में बात करते हैं। अभी आप थक गए होंगे। "

आत्म सम्मान

"सर, ये साहित्यिक सम्मान लेखक के तौर पर आपका करियर बना देगा। बस कुछ स्पोंसर्स दिलवा दीजिये इस समारोह के लिए। वैसे भी कॉर्पोरेट जगत में काफी पहचान है आपकी। " "रहने दीजिये मिश्रा जी, मेरा आत्म सम्मान किसी भी सम्मान से बड़ा है।"

अंतहीन इंतजार

"ये रोज यहाँ स्टेशन पर आते हैं । बिलकुल उसी समय पर जब ट्रेन आती है ।बात क्या है गंगाधर ? " नये स्टेशन मास्टर ने चाय वाले से पूछा । "कोइ नहीं है बाबा का.. बेटा था एक । शहर गया पर लौट के ना आया । बेटे के आने की उम्मीद ही है जो सालों से रोज खिंच लाती है उन्हें ।" " पर उनके बेटे को हुआ क्या ?" " अब का जानें सरकार, शहर निगल गया शायद ! हरिया बता रहा था कि शहर में रोज लावारिश लाशें मिलती....।" पूरा बोल नहीं पाया गंगूआ । अगले दिन से स्टेशन मास्टर बाबा को रोज अंदर बुला लेते अपने केबिन में । अब तो काफी अपनापन सा हो गया था उनके बीच । एक दिन कुछ इधर उधर की बातों के बाद वो बाबा से बोले " बाबा कब तक इंतजार करते रहेंगे। निराश नहीं करना चाहता आपको लेकिन बाबा कुछ परिंदे लौट के कभी नहीं आते ।" बाबा मुस्कुराये । एक गहरी सांस लेकर बोले " बेटा सब को लगता है मैं अपने बेटे की आस में यहाँ आता हूँ । लेकिन सच तो ये है कि वो आस तो कब की टूट गयी । अब तो बस आदत हो गयी है आने वाले मुसाफिर को देख कर खुश होने की । ऐसा लगता है मानो कलेजे को ठंढक सी मिल ग...

ये तरकीब उस दिन से अब तक काम आती है मेरे

"सुनो ! एक बात पूछूँ। " "पूछो "  "तुम्हें हमारी कौन सी बात सबसे ज्यादा याद है?"  "हम जब पहली बार मिले थे। कितने शर्मा रहे थे तुम। वैसे तुम्हे कौन सी बात याद है ?" "अपनी आखिरी मुलाकात। मेरे हाथों से अपना हाथ खींच लिया था तुमने हौले से। जाते जाते भी तीन चार बार पलटी थी तुम। " "हाँ ! और तुम अजीब से मुस्कुरा रहे थे। पहली बार वैसी मुस्कराहट दिखी थी तुम्हारे चेहरे पर। " "ठीक वैसे ही ना जैसे आजकल मुस्कुराता हूँ ? " "हाहाहा....।" हंस पड़ी वो। " तुम्हारे गम को छुपाने के लिए ये तरकीब उस दिन से अब तक काम आती है मेरे। " बोलना चाहता था पर बोल नहीं पाया ।

पहला बुद्ध

इंसान पशुता की गहरी खायी लांघ होमोसेपियन्स बनने के कगार पर था। अब उसने समझना शुरू किया था एक निश्चित अंतराल लगभग 70-80 साल का ही समय है उसके पास। फिर उसने दौड़ लगनी शुरू की समय के साथ। पर वो थकता, गिरता और संभालता लेकिन समय तो एक निश्चित वेग में भाग रहा था। कई पीढ़ी इंसानों की ऐसे ही समय आगे बेबस हो कर विदा हो गयी इस दुनिया से। फिर अचानक एक इंसान ने समय के साथ इस दौड़ को ध्यान से देखने की कोशिश की। गहरे ध्यान में उसने पाया की समय तो वही है दौड़ तो इंसान रहा है बस। बस उस दिन से उसके पास समय ही समय था। शायद पहला बुद्ध था वो अनाम इंसान।

दूर पड़े गीले गेंहूँ के दाने में से एक हरा पौधा फूट रहा था

मर गया किसान ! लहलहाते गेंहू की तस्वीर आँखों में दबाये । जिसे बेरहम मौसम ने कर दिया था बरबाद । उसके लहलहाते चिता पर सेंकी गइ रोटियाँ उसी गेंहूँ से । खाया जी भर के जिसे खद्दर टोपी धारी इंसानों ने । फिर सबसे बड़ा तोंद वाला बढ़ गया कुर्सी की ओर। दूर पड़े गीले गेंहूँ के दाने में से एक हरा पौधा फूट रहा था ।

बड़ा होने पर कितनी क़ुरबानी देनी पड़ती है

चिड़िया दिन भर इधर उधर फुदकती। रात को चुपचाप बूढ़े बरगद पर जाके बैठ जाती। बूढ़ा  बरगद अनेको चिड़िया का आश्रयदाता था। नन्ही चिड़िया उस पेड़ से काफी प्रभावित थी।  क़ैसे वो इतने चिड़ियों का आश्रय बन कर भी चुपचाप खड़ा रहता है। बिना किसी को मना किये। बिना कुछ  गर्व किये। चिड़िया ने कई बार सोचा कि काश वो पेड़ होती। भगवान ने आखिर उसकी सुन ली। चिड़िया को पेड़ बना दिया। अब तो वो अनेको चिड़ियों का आश्रय थी। कई दिन तक वो गर्व से फूले न समायी।  पर धीरे-धीरे वो ऊबने लगी थी। उसे अपना चिड़िया वाला फुदकना, स्वछन्द उड़ना याद आने लगा था।  अब वो समझ चुकी थी "बड़ा होने पर कितनी क़ुरबानी देनी पड़ती है। "

बारिश के रंग अनेक

"बारिश ने कितना रोमांटिक मौसम कर दिया है। चलो ना सी पी चलते हैं घूमने।" "अरे रहने दो आज मूड नहीं है।" "तुम न बड़े अनरोमांटिक हो। जाओ मैं तुमसे बात नहीं करती हुह्ह।" टों टों.. की आवाज के साथ फोन काट चुका था। कह नहीं पाया की आज सुबह बाबू जी का फोन आया था। इसी बारिश ने लहलहाती फसल बर्बाद कर दी थी।

इश्क़ वाला लव

"भीड़ है। मैं हूँ तुम हो। अब तो मैं और तुम हम हो गए हैं। भीड़ चल रही है। हम भी तो चल रहे हैं भीड़ के साथ। लेकिन ऐसा क्यों लगता है उड़ रहे हैं हम। इश्क़ का असर है शायद। अच्छा कभी गौर से देखो तो लगेगा हर शख्स उड़ रहा है। शरीर जमीं पर है लेकिन इश्क़ ने जैसे उठा रखा है सबके रूह को ऊपर। उस से कुछ ही ऊपर तो खुदा का दर है। देखो ना , इश्क़ का रंग जिसका जितना गहरा हो रहा है रूह उतनी ऊँची उठ रही है। तुम देख रही हो ना..?" "उम्म... हुम्म.... देखो ये आखिरी पेग था। अब हमें सो जाना चाहिए। तुम क्या बोल रहे हो मैं कुछ नहीं समझ पा रही हूँ। गुड नाईट...लव यू। "

लव बर्ड्स इन मेट्रो

"पास  नहीं  बैठोगे ?" "पर ये तो लेडीज सीट है " "बैठो ना...कोइ आएगा तो दुपट्टा से सर ढक दूंगी...यू नो ना एवरीथींग इज फेयर इन लव एंड...." # Love birds in Metro

गहरे पानी पैठ

सतह पर तैर कर बहुत वाहवाही लूटा उसने । रोज कूदता पानी में, खूब कलाकारी दिखाता तैरते हुए। लोग तालीयाँ बजाते, उसको सितारे की तरह पूजते । शुरू में तो वो बड़ा खुश हुआ, पर धीरे धीरे उब गया था। फिर वो पानी की सतह से नीचे उतरने लगा। उपर का शोर कम होने लगा था । वो और गहरे में उतरने लगा । अंधेरे में बढ़ते हुए अचानक चकाचौंध रौशनी दिखी उसे । अजीब से आनंद मे डूबा रहा घंटों तक । अब तो वो रोज आने लगा था उस रौशनी तक । कुछ दिन बाद उसे सतह पर कोइ और कलाबाजी दिखाते दिखा । लोग फिर तालियाँ बजा रहे थे । उसने महसूस किया लोग उसे भूला चुके थे । मुस्कुराते हुए वो फिर गहराइयों में उतरने लगा था ।

रवीश की लप्रेक है

"लेटेस्ट है कुछ??" "रवीश की लप्रेक है" "नहीं मै हिन्दी नहीं पढ़ती...चेतन भगत की हाफ गर्ल फ्रैंड है ..या दुर्जाय दत्ता का कोई ....।" "मैडम , डेन ब्राउन का लेटेस्ट नावल है..." "नहीं भैय्या रहने दो ...अच्छा सरिता या ग्रह शोभा है ???" #   रेल लघु कथा

वो कुलदेवी को नमाज सुना रही थी

नयी बहु और बेटे संग अम्मा कुलदेवी की प्रतिमा के सामने खड़ी थी। "बेटी मत्था टेको यहाँ..ये कुलदेवी हैं हमारी.." "पर अम्मा ! नगमा तो मुसलमा..." "अरे हाँ, मैं तो भूल ही गयी। रहने दो बेटा... वाक्य पूरा भी नही कर पायी अम्मा... देखा नगमा तो दोनों हाथ जोड़ आँखें बंद किये कुलदेवी के सामने खड़ी है।  कुछ देर बाद नगमा ने आँखें खोली तो पतिदेव प्यार से पूछ बैठे  " क्या बुदुबुदा रही थी नगमा " " वो जी, मुझे आरती और पूजा तो आते नहीं तो मैं कुलदेवी को नमाज सुना रही थी " बड़ी मासूमियत से जवाब दिया नगमा ने।  अम्मा को लगा जैसे धर्मों के बीच की दीवार भरभरा गयी हो। दोनों को बाहों में भींचते हुए बोली " प्यार में सच में बड़ी ताकत है ।"

स्माल टाउन बॉयज

"डोसा यहीं खा लेते हैं .." "नहीं पैक करवा लेते हैं, घर में ही खायेगें ..जानती हो ना इ फोर्क-स्पून-नाइफ वाला सिस्टम में मजा नै आता है .." "उफ्फ.. ये स्माल टाउन बॉयज .."

नयका जमाना के जमींदार

"दद्दा जमीन बचावे खातिर दिल्ली जाय के है कल.. बड़का अनसन है हुआँ। " 90 साल के दद्दा पूछ बैठे.. "पर बबुआ दिल्ली में काहे ?"  "दद्दा नयका जमाना के जमींदार हुवें रहेला.."

कलमकार

"कलम तू ऐसे नाराज ना हो मुझसे..कुछ लिख नहीं पाता हूँ।" "अच्छा जी । खुद तो मशगूल थे दुनियाभर की खुशियाँ बटोरने में और भूल गये अपनी कलम को ।" "ऐसा मत कह कलम । अरे मेरी सच्ची खुशी तो तुझसे ही है ।" "हुँह " "ऐसे मत रूठ, ये देख तेरे लिए क्या लाया हूँ। रिश्ते- नाते, गाँव-शहर, प्रेम-नफरत, सुख- दुःख सब के अनुभव ले आया हूँ तेरे लिये। " कलमकार अपनी महबूबा कलम को हाथ में लेकर सारे अनुभव सुनाने लगा। अनुभव, भावनाएं, कल्पना सब घुल रही थी कलम की स्याही में। कहानी ने अपना अकार लेना शुरू कर दिया था।