लड़ाई मंदिर के चढ़ावे को ले कर थी। बंटवारे के तहत गजानन पंडित जी को कार्तिकेय की मूर्ति का चढ़ावा मिला था जबकि उनके भाई कार्तिक पंडित जी को गणपति का चढ़ावा।
अब कार्तिकेय भगवान की मूर्ति पर चढ़ावा कम था गणपति के मूर्ति से, तो बात बिगड़ गयी। यहाँ तक की पंडो के बीच हाथापायी की नौबत आ गयी।
बड़े पंडित शिव कुमार जी ने इसका उपाय निकाला। अपने हिस्से के शिव और पार्वती की मूर्तियों को दोनों में बाँट दिया। माँ-बाप को अलग अलग बेटो के हिस्से में डाल दिया। अब शिव जी की मूर्ति कार्तिकेय की मूर्ति के साथ और माँ गौरी की मूर्ति गणपति की मूर्ति के साथ थी।
खैर चढ़ावा तकरीबन बराबर ही आने लगा था दोनों भाईयों को। तो सभी खुश थे इस बंटवारे से।
अब कार्तिकेय भगवान की मूर्ति पर चढ़ावा कम था गणपति के मूर्ति से, तो बात बिगड़ गयी। यहाँ तक की पंडो के बीच हाथापायी की नौबत आ गयी।
बड़े पंडित शिव कुमार जी ने इसका उपाय निकाला। अपने हिस्से के शिव और पार्वती की मूर्तियों को दोनों में बाँट दिया। माँ-बाप को अलग अलग बेटो के हिस्से में डाल दिया। अब शिव जी की मूर्ति कार्तिकेय की मूर्ति के साथ और माँ गौरी की मूर्ति गणपति की मूर्ति के साथ थी।
खैर चढ़ावा तकरीबन बराबर ही आने लगा था दोनों भाईयों को। तो सभी खुश थे इस बंटवारे से।
