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बलि का बकरा

"तो मतलब की सबसे बुरबक हम ही हुए ना जी … साला टोपर थे स्कूल के। सबको बनना था डॉक्टर -इंजिनियर।  लेकिन हमको तो शौक था बनने का  समाज सुधारक। तो बन गये पत्रकार। ऐसे भी दुए टाइप का आदमी देश सुधार पाया है आज तक या तो पत्रकार या फिर वकील।  लेकिन घंटा ना कुछ कर पाए, सारा जवानी बिताये यूनिवर्सिटी के राजनीति में और अब जाके जब थोड़ा सा कमाने का टाइम आया है तो कहते हो की सिद्धांत के विरुद्ध जा रहे हैं हम।  अबे कब तक इस खद्दर और फटफटिया से काम चलते रहेंगे।  साला नॉन डेजर्विंग सब कमा के बुर्ज हो गया है और हमही रह गये सबसे बुद्धू ।  \"  "लेकिन भैया उन सैकड़ों युवाओं का क्या जो आपको आदर्श मानते हैं …" "अरे रहने दो भाई … इनका क्या है फिर से किसी को ढूंढ़ लेंगे बलि का बकरा बनाने के लिए … चढ़ा देंगे झाड़ पर और मान लेंगे उसको अपना आदर्श …"

संस्कार-हीन

दालान पर कुछ लोग आये थे , शायद  छोटे चाचा के विवाह के सन्दर्भ में ....घर के बड़े बुजुर्ग सेवा सत्कार में लगे थे ....तभी घर का एक छोटा बच्चा  जाने किधर से आया और आते ही सबके पैर छूने लगा ....बाबा ने बताया था की कोई भी दरवाजे पर आये तो पैर छूना चाहिए ... "अरे कितना संस्कारी बच्चा  है ...."इतनी छोटी उमर में इतना संस्कार ...... बच्चा  मन ही मन प्रफ्फुलित हो चला था .....तभी मझले चाचा ने उसे घर के अन्दर से बुलाया ....बच्चा भगा भगा पहुंचा ....मन अभी भी बाहर हुए प्रशंशा से आह्लादित था ....की तभी चाचा ने देखते ही उसके कान पर एक थप्पड़ जर दिया ...और घर की महिलाओं के सामने उसे डांटते हुए कहा ...."एकदम संस्कार हीन  हो गया है .....पंडित का बच्चा होके मल्लाह का पैर छूता है ..... बच्चा रोते हुए समझने  की कोशिश कर रहा था की ....शायद  बाहर आये लोगों में से कोई मल्लाह भी था .....और ब्रह्मण का बच्चा होके ......... बच्चा अब बड़ा हो गया है लेकिन बचपन का वो थप्पड़ अभी भी उसके मन में कहीं न कहीं अंकित है ........!!!

रेड लाइट पर वो बूढी औरत

रोज ऑफिस से आता हूँ घर को।  रोज NTPC  के  रेड लाइट पर वो बूढी औरत दिखती है। हर गाड़ी के आगे हाथ जोड़कर मांगते  हुए। टूटे काले फ्रेम के अन्दर धंसी हुई आँखें ,मटमैली साड़ी जो शायद कभी सफ़ेद रही होगी , कंधे पर पुराना सा झोला,झुकी हुई देह को लाठी से  टेके।  कभी कभी मेरे ऑटो के सामने भी आती है , हाथ जोड़े हुए।  कभी कभी कुछ देने का सोचता हूँ, लेकिन .कुछ कल्पित सवालों में उलझ जाता हूँ। बुढिया क्या सोचती होगी मांगते हुए ? कोई कुछ दे दे तो ?? कोई कुछ भी ना दे तो   ? कहा  रहती होगी ? उसके पति और  बच्चे ? कब से मांगती होगी ?  कब तक ऐसे मांगती रहेगी ? उम्र भी तो आखिरी पड़ाव में ही है।  फिर कुछ और उलझे सवाल जैसे यही बुढिया  क्यों  ? सामाजिक असमानता इत्यादि, इत्यादि।  फिर से गाड़ियों के कान फोडू  होर्न  से विचारों की श्रृंखला टूटती है। बुढिया  मांगते मांगते दूर निकल गयी है। सामने लाल बत्ती भी अपना रंग बदल चुकी है।   मेरे विचारों ने भी रंग बदल लिया है।  कल फिर से ऑफ...

वक्ता

हाथ छूट रहे थे।  आखिरी ही मुलाकात थी, शायद। हमेशा की तरह कुछ कहना चाहता था , मगर कह नहीं पाया। . . . सुना है आजकल अच्छे  वक्ताओं में गिनती होती है उसकी। 

गुरु-शिष्य परंपरा

" आज -कल वो गुरु-शिष्य परंपरा नहीं रही "- कहते हुए डॉ रमनन ने सिगरेट सुलगाई ... अब छात्रों से वो इज्जत कहा मिलती है teachers को ....! '' Sir Time has changed ..अब छात्र विद्या अर्जन करने नहीं बल्कि खरीदने आते हैं " " Yes Mohit - खैर मुझे क्या करना है इन बातों का .....Forget those things ...अब ये teachers का जो खम्भा बचा है उसे भी तो ख़तम करना है .... " मोहित आज्ञाकारी छात्र की तरह तन्मयता से गुरु आज्ञा पालन में लग गया ........