"तो मतलब की सबसे बुरबक हम ही हुए ना जी … साला टोपर थे स्कूल के। सबको बनना था डॉक्टर -इंजिनियर। लेकिन हमको तो शौक था बनने का समाज सुधारक। तो बन गये पत्रकार। ऐसे भी दुए टाइप का आदमी देश सुधार पाया है आज तक या तो पत्रकार या फिर वकील। लेकिन घंटा ना कुछ कर पाए, सारा जवानी बिताये यूनिवर्सिटी के राजनीति में और अब जाके जब थोड़ा सा कमाने का टाइम आया है तो कहते हो की सिद्धांत के विरुद्ध जा रहे हैं हम। अबे कब तक इस खद्दर और फटफटिया से काम चलते रहेंगे। साला नॉन डेजर्विंग सब कमा के बुर्ज हो गया है और हमही रह गये सबसे बुद्धू । \" "लेकिन भैया उन सैकड़ों युवाओं का क्या जो आपको आदर्श मानते हैं …" "अरे रहने दो भाई … इनका क्या है फिर से किसी को ढूंढ़ लेंगे बलि का बकरा बनाने के लिए … चढ़ा देंगे झाड़ पर और मान लेंगे उसको अपना आदर्श …"
लघुकथा अपने आप में एक सम्पूर्ण कथा होती है। इसे गागर में सागर कहें या फिर "देखन में छोटन लगे - घाव करे गंभीर " कहा जा सकता है।