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संस्कार-हीन


दालान पर कुछ लोग आये थे , शायद  छोटे चाचा के विवाह के सन्दर्भ में ....घर के बड़े बुजुर्ग सेवा सत्कार में लगे थे ....तभी घर का एक छोटा बच्चा  जाने किधर से आया और आते ही सबके पैर छूने लगा ....बाबा ने बताया था की कोई भी दरवाजे पर आये तो पैर छूना चाहिए ...
"अरे कितना संस्कारी बच्चा  है ...."इतनी छोटी उमर में इतना संस्कार ......
बच्चा  मन ही मन प्रफ्फुलित हो चला था .....तभी मझले चाचा ने उसे घर के अन्दर से बुलाया ....बच्चा भगा भगा पहुंचा ....मन अभी भी बाहर हुए प्रशंशा से आह्लादित था ....की तभी चाचा ने देखते ही उसके कान पर एक थप्पड़ जर दिया ...और घर की महिलाओं के सामने उसे डांटते हुए कहा ...."एकदम संस्कार हीन  हो गया है .....पंडित का बच्चा होके मल्लाह का पैर छूता है .....
बच्चा रोते हुए समझने  की कोशिश कर रहा था की ....शायद  बाहर आये लोगों में से कोई मल्लाह भी था .....और ब्रह्मण का बच्चा होके .........
बच्चा अब बड़ा हो गया है लेकिन बचपन का वो थप्पड़ अभी भी उसके मन में कहीं न कहीं अंकित है ........!!!

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मूर्तिकार

मूर्तिकार की व्यस्तता बता रही थी की दुर्गा पूजा काफी नजदीक आ चुकी है। महिषासुर और माता की अनेकों मूर्तियाँ विभिन्न आकर और रूपों में पड़ी थी। लेकिन एक मूर्ति कुछ ज्यादा ही भव्य बनके उभर रही थी। मूर्तिकार भी इधर उधर मिटटी चढ़ा के उसे और सुन्दर बनाने में लगा था। बीच बीच में आत्म मुग्ध होकर काफी देर तक निहारता भी रहता उस मूर्ति को।  रात हो चुकी थी। दिन भर के थकान को भूल अपनी ही धुन में लगा पड़ा था। जाने कब नींद आ गयी उसे। अचानक सपने में उसे वही मूर्ति मुस्कुराती नजर आई। सम्मोहित सा  खड़ा रहा वो। मूर्ति की मुस्कान और भी गहरी हो गयी। एक विचित्र सी आभा फैलने लगी चहुओर। घंटियों और शंखों की आवाज आने लगी ,अगरबत्ती और धूप का धुंआ जैसे फ़ैल गया था। फिर अचानक एक सैलाब आया पानी का। वो मूर्ती अब डूब रही थी, उसके रंग पानी में घुलने लगे थे। घंटियों और शंखों की आवाज और तेज़ हो गयी थी। देखते ही देखते मूर्ती गायब हो गयी। मूर्तिकार सपने में रोने लगा। फिर उसे लगा कोई उसके आंसू पोछ रहा है। गौर से देखा , अरे ये तो माँ है....जगत जननी नहीं बल्कि उसकी जननी।

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" आज -कल वो गुरु-शिष्य परंपरा नहीं रही "- कहते हुए डॉ रमनन ने सिगरेट सुलगाई ... अब छात्रों से वो इज्जत कहा मिलती है teachers को ....! '' Sir Time has changed ..अब छात्र विद्या अर्जन करने नहीं बल्कि खरीदने आते हैं " " Yes Mohit - खैर मुझे क्या करना है इन बातों का .....Forget those things ...अब ये teachers का जो खम्भा बचा है उसे भी तो ख़तम करना है .... " मोहित आज्ञाकारी छात्र की तरह तन्मयता से गुरु आज्ञा पालन में लग गया ........