"कलम तू ऐसे नाराज ना हो मुझसे..कुछ लिख नहीं पाता हूँ।" "अच्छा जी । खुद तो मशगूल थे दुनियाभर की खुशियाँ बटोरने में और भूल गये अपनी कलम को ।" "ऐसा मत कह कलम । अरे मेरी सच्ची खुशी तो तुझसे ही है ।" "हुँह " "ऐसे मत रूठ, ये देख तेरे लिए क्या लाया हूँ। रिश्ते- नाते, गाँव-शहर, प्रेम-नफरत, सुख- दुःख सब के अनुभव ले आया हूँ तेरे लिये। " कलमकार अपनी महबूबा कलम को हाथ में लेकर सारे अनुभव सुनाने लगा। अनुभव, भावनाएं, कल्पना सब घुल रही थी कलम की स्याही में। कहानी ने अपना अकार लेना शुरू कर दिया था।
लघुकथा अपने आप में एक सम्पूर्ण कथा होती है। इसे गागर में सागर कहें या फिर "देखन में छोटन लगे - घाव करे गंभीर " कहा जा सकता है।