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आखिरी प्रजाति

वो आखिरी बचा था अपने बिरादरी का । उसके भाई बंधू एक एक कर के समर्पण कर चुके थे या गायब होते जा रहे थे । दरअसल उसकी प्रजाति का एकछत्र राज्य था लेकिन फिर पाशा पलटा और एक एक करके पूरी प्रजाति को खत्म करने की सादिश रच दी गयी । उसकी प्रजाति को खत्म करने की साजिश में कुछ उससे छोटी जाति वाले भी शामिल थे । बाहर से आये किसी नये प्रजाति वाले को सत्ता दी जा रही थी ।खबर तो ये भी आयी थी कि कुछ डरपोक किस्म के सदस्यों ने नदी में डूब कर आत्महत्या कर ली थी , कुछ की लाश सड़कों पर टूकड़ों में मिली । अब हर तरफ बाहर से आयी नयी प्रजाति का बोलबाला था । आखिरी बचे उस सदस्य ने नये गुलाबी सी प्रजाति की झलक देखी । जो इंसान कल तक उसकी प्रजाति के भक्त थे आज उसे जलालत की नजर से देख रहे थे । पुराने चमचों ने भी गुलाबो का दामन थाम लिया । उसने सोचा समर्पण के बाद भी तो अंत ही होना है, इसलिये चुपके से खिसक लिया वहाँ से । इंसान उसे ढूँढ़ रहा था लेकिन वो घर के कोने के अँधेरे में छुप गया था अनंत काल के लिये । वो आखिरी 1000 का नोट था ।

नोट_वाला_लव

तेरी आँखे आजकल दो दो हजार की नोट सी लगती है, लगता है जैसे दिन भर एटीएम की लाइन में लगा हूँ और तुम्हें देखते ही थकान गायब । चलो आज एक वादा करता हूँ मेरा प्यार भी 100 के नोट की तरह ही रहेगा ज्यादा न सही लेकिन कभी बंद नहीं होगा ..;) :) #नोट_वाला_लव4

रमुआ की दिवाली

"ऐ ताई रुक जा उधर अभी झाड़ू मत लगा " कचड़ा बीनना छोड़ रमुआ लपका उधर। "का करेगा तू ?" "अरे देखने दे ताई, बहुत से पटाखे होंगे इसमें जो जले नहीं होंगे। अपनी दिवाली तो आज ही मानेगी इन पटाखों से। "

अरमान

वो रोज मेरा गरदन दबाने आता था । भीड़ भाड़ में मेरे सर पे लटका रहता । पर अकेले में जब भी मैं होता वो मेरा गरदन दबाने लगता । कई दफा मैंने उससे पीछा छूड़ाने की कोशिश की । लेकिन हर बार मैं हार जाता । दरअसल उसकी आदत हो चुकी थी मुझे । मैंने खुद उसे सर पे बिठा रख्खा था । एक दिन मुझे लगा आज मुझे वो मार ही डालेगा । दर्द असह्य था और जीना मुश्किल । आखिरकार हिम्मत करके मैंने उसका गला दबा दिया । अब मेरा अरमान मर चुका था । वो अरमान जिसने मेरा जीना मुश्किल कर रख्खा था । अब मैं जी सकता था । लेकिन हुआ उल्टा । अरमान के मरते ही मैं भी मर चुका था । अब शरीर बचा था, मैं काफी हल्का महसूस कर रहा था लेकिन जान नहीं थी । # योगी_की_डायरी_से

इस बार रावण सीता जलायेगी

रामलीला कमेटी में इस बार बड़ी हलचल थी। राम बने व्यक्ति ने अजीबोगरीब स्थिति उत्पन्न कर दी थी। उनका कहना था की इस बार रावण, सीता जलायेगी। सब हैरान थे। "देखिये रावण का नाश तो वास्तव में सीता ने ही किया था। तीर भले ही रामचंद्र के थे लेकिन तीर की वजह और तीर में शक्ति तो सीता मैय्या की ही थी। " "देखो भैया रामायण के साथ छेड़ छाड़ ना करो, जो होता आया है वही होगा। " - बुजुर्ग कमेटी मेंबर ने कहा। "नहीं काका चीजें बदल रही हैं, औरतों को समाज में उनका हिस्सा मिल रहा है। अब तो जरूरत है कि जो हमारे पौराणिक देवियाँ हैं उन्हें भी उनका हक़ मिल सके। " कुछ देर वाद विवाद चलता रहा। अंत में सब ने रामचंद्र का निर्णय स्वीकार कर लिया। त्रेता के राम का कुछ अंश इस कलयुगी राम में भी आ गया था जो अपने छूटे कार्य को पूर्ण कर रहा था।

टिड्डा

मेट्रो का दरवाजा बंद होते ही मैंने देखा एक टिड्डा अंदर घुस गया था । ठसाठस भरे मेट्रो में कोने में खड़ा मैं उसके एक्टिविटी को देखने लगा । शायद किसी और ने नोटिस किया नहीं था । टिड्डा पहले तो वाल पे रास्ता ढूँढ़ता रहा फिर एक के सर पर जाके बैठ गया । वो कान में हेडफोन लगाये गाना सुन रहा था और सर हिला रहा था । टिड्डा भी मानो झूला झूल रहा हो । उसके स्पाइक्स वाले बालों पर चलते चलते अब टिड्डा दूसरे सर पर आ चुका था । दूसरे बंदे ने अचानक सर हिलाया और टिड्डा जाके एक मैडम के गोद में जा गिरा । मैडम चिल्ला उठी और अपना पल्लू झटक दिया । अब तो लोगों में हलचल मच गयी, टिड्डा इधर से उधर फेंका जा रहा था । मेरे मन में बैचैनी होने लगी । इत्ते देर से टिड्डे को देखते देखते एक लगाव हो गया था । अचानक एक सभ्य सी दिखने वाली मैडम ने अपने बैग से टिड्डे को मारना शुरू किया । टिड्डा धाराशायी हो गया । मैं चिल्ला उठा : - "अबे क्यों मार दी..इसने क्या बिगाड़ा था तेरा ।" जाने मुझे क्या हो गया था, मैं नर्वस जैसा हो गया था। कानों में आवाज आ रही थी : " भाई तू क्यों परेशान हो रहा है, तेरा...

बेचारी अपना घर बार छोड़ के तुम्हे अपनाएगी

"सच कहूँ तो पापा दिल के मरीज हैं सेहन नही कर पायेंगे की उनका लड़का किसी छोटे जात की लड़की को ब्याह लाया है" "और हमारा प्यार...." "चाहे मेरा ब्याह कहीं हो लेकिन दिल में तो हमेशा तुम ही रहोगी...बस तुम ..." कुछ देर की ख़ामोशी के बाद "वैसे एक बात कहूँ तुम्हे मेरी कसम जिससे ब्याह के लाओगे बस उसी को सब कुछ मानना...बेचारी अपना घर बार छोड़ के तुम्हे अपनाएगी..."

जीत-हार सब बेकार

वो जीत रहा था लेकिन उसके अंदर का एक हिस्सा खामोश था । वो हारा तब भी उसके अंदर का वो हिस्सा खामोश था । जीत में वो उस हिस्से को इग्नोर मार गया । पर जब वो हार रहा था तो उस हिस्से की खामोशी पर झुंझला उठा । अंदर के उस हिस्से ने कहा-  " धैर्य रख ! तू फिर जीतेगा और मुझे फिर इग्नोर मारेगा ।" इंसान ने गौर से देखा अंदर के उसी हिस्से में राम, अल्लाह और ईसा नजर आया 

क्रेडिट

बाती को जलाने में तेल ने अपने को दांव पर लगा रखा था। अँधेरा ने उनकी हिम्मत के सामने घुटने टेक दिया।  लेकिन क्रेडिट दिए को मिला।  क्यूंकि बाती और तेल क्रेडिट लेने के लिए बचे नही रहे।

~ एक झूठी सी आशा ~

जंग लगे उस ताले की चाभी बहुत पहले खो चुकी थी। कुछ प्रयास हुआ उस ताले को तोड़ने का और चाभी ढूंढने का भी । पर शायद किसी के बस में नहीं था कि वर्षों से लगा वो ताला खुल जाए। लेकिन कुदरत की कुछ और ही चाह थी। जाने कहाँ से एक पौधा पनप गया था उस ताले में। अब एक संघर्ष था उस बेरंग ताले और खूबसूरत पौधे के बीच। संघर्ष अपने अस्तित्व बचाने की। ताले के जंग ने पौधे के जड़ को खाने की बहुत कोशिश की। लेकिन हर कहानी की तरह इस बार भी जीत अच्छाई की हुयी, ताला टूट गया। कश्मीर से आतंकवाद का ताला टूट चूका था, बुरहान वानी जैसे कितने जंग के छोटे - छोटे टुकड़े मिटटी में दफ़न हो गए थे, शांति की हरियाली धरती के जन्नत में एक बार फिर से फ़ैल गई थी।

कहानी

शायरी से शुरुआत की थी, फिर सुन्दर कविता की तरह हो गए थे लेकिन अंत में कहानी बन के रह गए !! ‪#‎ सुलक‬  - सुक्ष्म_लघु _कथा

वो देखो चाँद...

"बाबा भूख लगी है .." "बेटे वो देखो चाँद...कितना सुंदर लग रहा है .." फुटपाथ पर बच्चा रोता रहा ...बेबस भिखारी उसे बहलाता रहा । कुछ साल बाद वही बच्चा अपने छोटे भाई को बहलाने की कोशिश कर रहा था ! " वो देख चाँद ...." चाँद वही था , भूख भी वही थी । हाँ लेकिन इस बार वो फुटपाथ से फ्लाइओवर के नीचे आ गये थे ।

उजाले की ओर

"साहब, 10,000 से कम नहीं लूँगी..  " उस औरत ने आखिरी बार कहा। "अरे चल भाई ! आगे 6,000 में मिल जायेगी... " साहेब ने ड्राइवर से कहा। "पक्का साहब ? " ड्राइवर ने अनमने ढंग से पूछा । "हाँ भाई ! चल सीसा चढ़ा आगे चल ।" गाड़ी जैसे ही वहाँ से निकली । साहब ने तुरंत ही गाड़ी रूकवायी । "क्या हुआ साहेब ?" "अबे तू रूक जा यहीं, मैं 6,000 में बात करके आ रहा हूँ ।" साहब वापस आ गये थे उस औरत के पास । "ये ले 10,000..." "क्या साहब, पैसे तो सुबह भी दे सकते थे ।" मुस्कुरायी वो । "सुन आज  तू रेस्ट कर जाके .." बोल के साहेब निकल लिये । गाड़ी के पास पहुँचे तो ड्राइवर बोला : " क्या हुआ साहेब ? " " अबे चल सही माल नहीं थी। " ड्राईवर अब दिल्ली के पाॅश एरिया में गाड़ी भगा रहा था और सोच रहा था साहेब भी पता नहीं कैसा कंजर है, रोज इधर से गुजरता है और पैसे को लेकर ऐसा ही नाटक करता है । साहेब के चेहरे पर संतुष्टि  का भाव था । वहाँ पीछे 10,000 लिये वो औरत सन्न सी खड़ी थी । रात खुद-ब-खुद उजाले की ओ...

प्रेम उड़ान

प्रेम का आकर्षण ही था जिसने उसके मन में खलबली मचा थी । मन उसे अजनबी डर से डरा भी रहा था, तो मन उसे प्रेम के सागर की ओर धकेल भी रहा था । उसने मन के अंदर देखा तो उसे दिखा कि मन के अंदर भी बहुत सी औरते थी। जो हाथ जोड़े एक दूसरे को खींचे खड़ी थी। वो हाथ का जोड़ ऐसा था मानो एक सुरक्षा कवच की तरह था। लेकिन प्रेम के प्रकाश में वो कवच बंधन नजर आ रहा था। ऐसा बंधन जिसने हर औरत को सदियों से अंदर तक जकड रखा था। प्रेम के खिंचाव ने जुड़े हुए हाथों को खोल दिया था। मन के अंदर की सारे औरतें हाथ छूटते ही गायब हो गयी । अब वो स्वछंद थी । उसने प्रेम के सागर में छलाँग लगाया। लेकिन प्रेम की खासियत थी इसमें डूबने वाला उपर उठ जाता था । अब वह प्रेम के अनंत आकाश में उन्मुक्त उड़ान भर रही थी ।

प्रतिच्छाया

"आओ गुड्डू हम एक गेम खेलते हैं। वो देखो पापा कैसे हाथ उठा के चिल्ला रहे हैं। तुम न पापा की तरह चिल्लाओ और मैं मम्मी की तरह दोनों हाथ ऐसे करके चिल्लाऊंगी। " नन्ही परी अपने टैडी "गुड्डू "को दरवाजे पर बन रहे प्रतिच्छाया को देखकर समझा रही थी। अगले दिन नास्ते की टेबल पर परी पापा से बोली :  " पापा आप मेरा एक छोटा सा काम कर दोगे। " "बोलो बेटा " बड़े दुलार से पूछा पापा ने। "आप मेरे टैडी को लड़ना सीखा दोगे। वैसे जैसे आप और मम्मी लड़ते हैं। मैं न मम्मी की तरह तो कर लेती हूँ पर ये गुड्डू आपकी तरह कर नहीं पाता है। कल से ही सीखा रही हूँ इसे पर ये सीखता ही नहीं। " पापा अवाक् थे। पीछे खड़ी माँ के भी पैर के नीचे से जमीन खिसक गयी थी। अगली रात से वो  प्रतिच्छाया कभी नजर नहीं आई।

बुजुर्ग कदम - युवा मन

सालों बाद मिले थे देवकुमार और मीनल । विदेश में दशकों रहने के बाद जब मीनल वापस अपने शहर आयी तो अचानक देव से मुलाकात हो गयी । वही देव जो उसके प्रेम का देव था कभी, किन्तु दोनों के माँ बाप ने उन्हें मिलने ना दिया था । आज भी वो देव को नहीं पहचान पाती लेकिन मीनल की आँखें तो देव कभी भूला ही नहीं था । देखते ही पहचान गया । कुछ देर हाल चाल  होने के बाद; "चलो अपने पुराने अड्डे पर चलते हैं। जानती हो वहां एक कॉफी शॉप खुल गया है। " "अरे पर बच्चे घर में इंतजार कर रहे होंगे। " "अरे छोडो भी बच्चे भी तो अब बड़े हो गए हैं। अच्छा चलो फ़ोन कर लो। " "मुद्दत बाद मिले हो लेकिन बदले बिलकुल नहीं। पर थोड़े बुड्ढ़े हो गए हो। " "और तुम ?" "मैं तो अभी भी वैसी ही हूँ, स्वीट सिक्सटीन। हाहाहाहा। " "अरे ! धीरे बोलो कोई सुनेगा तो क्या कहेगा बुड्ढे बुड्ढी पागल हो गए हैं। अच्छा तुम्हारा परमेश्वर कैसा है ?" "कौन परमेश्वर ?" "अरे पति परमेश्वर " "हाहाहा ! तुम भी न पोते पोती हो गये पर सुधरे नहीं हो " "याद है आखिरी...

शोभा

हवेली के बाहर का पेड़ हवेली की शोभा बिगाड़ रहा था। मालिक ने उसे कटवा दिया।  कुछ दिनों बाद भूकम्प में हवेली धराशायी हो गयी। प्रकृति ने अपनी शोभा बिगाड़ रही हवेली को कटवा दिया था।

सिगरेट पी के किस मत किया करो

"सिगरेट पी के किस मत किया करो। कितनी बार बताया है, इसकी बदबू मैं बर्दाश्त नहीं कर सकती।" "अच्छा जी और वोडका की बदबू नहीं आती किस करते हुए।"  झुंझला के लड़के ने कहा "मैंने कह दिया न तो बस।" लड़की ने झुंझला के मानो फैसला सुना दिया हो। "अच्छा ओके बाबा।" लड़का ने  मुस्कुरा के स्थिति सँभालने की कोशिश की। लड़की ने मन ही मन कहा - " भूल गयी हूँ उसे फिर भी साला जब किसी और की सांस से सिगरेट की स्मेल सीधे नाक में घुसती है तो याद आ ही जाता है कमबख्त। कुत्ता, साला।" और जल्दी से अगला पेग बनाने लगी।