वो आखिरी बचा था अपने बिरादरी का । उसके भाई बंधू एक एक कर के समर्पण कर चुके थे या गायब होते जा रहे थे । दरअसल उसकी प्रजाति का एकछत्र राज्य था लेकिन फिर पाशा पलटा और एक एक करके पूरी प्रजाति को खत्म करने की सादिश रच दी गयी । उसकी प्रजाति को खत्म करने की साजिश में कुछ उससे छोटी जाति वाले भी शामिल थे । बाहर से आये किसी नये प्रजाति वाले को सत्ता दी जा रही थी ।खबर तो ये भी आयी थी कि कुछ डरपोक किस्म के सदस्यों ने नदी में डूब कर आत्महत्या कर ली थी , कुछ की लाश सड़कों पर टूकड़ों में मिली । अब हर तरफ बाहर से आयी नयी प्रजाति का बोलबाला था । आखिरी बचे उस सदस्य ने नये गुलाबी सी प्रजाति की झलक देखी । जो इंसान कल तक उसकी प्रजाति के भक्त थे आज उसे जलालत की नजर से देख रहे थे । पुराने चमचों ने भी गुलाबो का दामन थाम लिया । उसने सोचा समर्पण के बाद भी तो अंत ही होना है, इसलिये चुपके से खिसक लिया वहाँ से । इंसान उसे ढूँढ़ रहा था लेकिन वो घर के कोने के अँधेरे में छुप गया था अनंत काल के लिये । वो आखिरी 1000 का नोट था ।
" आज -कल वो गुरु-शिष्य परंपरा नहीं रही "- कहते हुए डॉ रमनन ने सिगरेट सुलगाई ... अब छात्रों से वो इज्जत कहा मिलती है teachers को ....! '' Sir Time has changed ..अब छात्र विद्या अर्जन करने नहीं बल्कि खरीदने आते हैं " " Yes Mohit - खैर मुझे क्या करना है इन बातों का .....Forget those things ...अब ये teachers का जो खम्भा बचा है उसे भी तो ख़तम करना है .... " मोहित आज्ञाकारी छात्र की तरह तन्मयता से गुरु आज्ञा पालन में लग गया ........
