वो आखिरी बचा था अपने बिरादरी का । उसके भाई बंधू एक एक कर के समर्पण कर चुके थे या गायब होते जा रहे थे । दरअसल उसकी प्रजाति का एकछत्र राज्य था लेकिन फिर पाशा पलटा और एक एक करके पूरी प्रजाति को खत्म करने की सादिश रच दी गयी । उसकी प्रजाति को खत्म करने की साजिश में कुछ उससे छोटी जाति वाले भी शामिल थे । बाहर से आये किसी नये प्रजाति वाले को सत्ता दी जा रही थी ।खबर तो ये भी आयी थी कि कुछ डरपोक किस्म के सदस्यों ने नदी में डूब कर आत्महत्या कर ली थी , कुछ की लाश सड़कों पर टूकड़ों में मिली । अब हर तरफ बाहर से आयी नयी प्रजाति का बोलबाला था । आखिरी बचे उस सदस्य ने नये गुलाबी सी प्रजाति की झलक देखी । जो इंसान कल तक उसकी प्रजाति के भक्त थे आज उसे जलालत की नजर से देख रहे थे । पुराने चमचों ने भी गुलाबो का दामन थाम लिया । उसने सोचा समर्पण के बाद भी तो अंत ही होना है, इसलिये चुपके से खिसक लिया वहाँ से । इंसान उसे ढूँढ़ रहा था लेकिन वो घर के कोने के अँधेरे में छुप गया था अनंत काल के लिये । वो आखिरी 1000 का नोट था ।
मूर्तिकार की व्यस्तता बता रही थी की दुर्गा पूजा काफी नजदीक आ चुकी है। महिषासुर और माता की अनेकों मूर्तियाँ विभिन्न आकर और रूपों में पड़ी थी। लेकिन एक मूर्ति कुछ ज्यादा ही भव्य बनके उभर रही थी। मूर्तिकार भी इधर उधर मिटटी चढ़ा के उसे और सुन्दर बनाने में लगा था। बीच बीच में आत्म मुग्ध होकर काफी देर तक निहारता भी रहता उस मूर्ति को। रात हो चुकी थी। दिन भर के थकान को भूल अपनी ही धुन में लगा पड़ा था। जाने कब नींद आ गयी उसे। अचानक सपने में उसे वही मूर्ति मुस्कुराती नजर आई। सम्मोहित सा खड़ा रहा वो। मूर्ति की मुस्कान और भी गहरी हो गयी। एक विचित्र सी आभा फैलने लगी चहुओर। घंटियों और शंखों की आवाज आने लगी ,अगरबत्ती और धूप का धुंआ जैसे फ़ैल गया था। फिर अचानक एक सैलाब आया पानी का। वो मूर्ती अब डूब रही थी, उसके रंग पानी में घुलने लगे थे। घंटियों और शंखों की आवाज और तेज़ हो गयी थी। देखते ही देखते मूर्ती गायब हो गयी। मूर्तिकार सपने में रोने लगा। फिर उसे लगा कोई उसके आंसू पोछ रहा है। गौर से देखा , अरे ये तो माँ है....जगत जननी नहीं बल्कि उसकी जननी।
