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जुलाई, 2016 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

जीत-हार सब बेकार

वो जीत रहा था लेकिन उसके अंदर का एक हिस्सा खामोश था । वो हारा तब भी उसके अंदर का वो हिस्सा खामोश था । जीत में वो उस हिस्से को इग्नोर मार गया । पर जब वो हार रहा था तो उस हिस्से की खामोशी पर झुंझला उठा । अंदर के उस हिस्से ने कहा-  " धैर्य रख ! तू फिर जीतेगा और मुझे फिर इग्नोर मारेगा ।" इंसान ने गौर से देखा अंदर के उसी हिस्से में राम, अल्लाह और ईसा नजर आया 

क्रेडिट

बाती को जलाने में तेल ने अपने को दांव पर लगा रखा था। अँधेरा ने उनकी हिम्मत के सामने घुटने टेक दिया।  लेकिन क्रेडिट दिए को मिला।  क्यूंकि बाती और तेल क्रेडिट लेने के लिए बचे नही रहे।

~ एक झूठी सी आशा ~

जंग लगे उस ताले की चाभी बहुत पहले खो चुकी थी। कुछ प्रयास हुआ उस ताले को तोड़ने का और चाभी ढूंढने का भी । पर शायद किसी के बस में नहीं था कि वर्षों से लगा वो ताला खुल जाए। लेकिन कुदरत की कुछ और ही चाह थी। जाने कहाँ से एक पौधा पनप गया था उस ताले में। अब एक संघर्ष था उस बेरंग ताले और खूबसूरत पौधे के बीच। संघर्ष अपने अस्तित्व बचाने की। ताले के जंग ने पौधे के जड़ को खाने की बहुत कोशिश की। लेकिन हर कहानी की तरह इस बार भी जीत अच्छाई की हुयी, ताला टूट गया। कश्मीर से आतंकवाद का ताला टूट चूका था, बुरहान वानी जैसे कितने जंग के छोटे - छोटे टुकड़े मिटटी में दफ़न हो गए थे, शांति की हरियाली धरती के जन्नत में एक बार फिर से फ़ैल गई थी।

कहानी

शायरी से शुरुआत की थी, फिर सुन्दर कविता की तरह हो गए थे लेकिन अंत में कहानी बन के रह गए !! ‪#‎ सुलक‬  - सुक्ष्म_लघु _कथा

वो देखो चाँद...

"बाबा भूख लगी है .." "बेटे वो देखो चाँद...कितना सुंदर लग रहा है .." फुटपाथ पर बच्चा रोता रहा ...बेबस भिखारी उसे बहलाता रहा । कुछ साल बाद वही बच्चा अपने छोटे भाई को बहलाने की कोशिश कर रहा था ! " वो देख चाँद ...." चाँद वही था , भूख भी वही थी । हाँ लेकिन इस बार वो फुटपाथ से फ्लाइओवर के नीचे आ गये थे ।