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जून, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

रात की कहानी

शाम की किरणों ने अंदाजा लगाया था की रात की कहानी रोचक होगी। भोर होते ही किरणें दौड़ पड़ी उस ओर। खिड़की के अधखुले पल्ले से, परदे की ओट से निकल कर पहुंच गयी बिस्तर पर। बिस्तर  की सिलवटें बता रही थी रात कुछ ख़्वाबों ने जन्म लिया है। फिर किरणें कुछ आगे बढ़ी। तकिया दिखा गीला सा। शायद कुछ खब्बों का क़त्ल भी हुआ था। 

कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन्

पसीने की बूँद कान के ऊपरी हिस्से से होते हुए गर्दन के नीचे फिसल रही थी। धूल की एक हलकी परत जम गयी थी चेहरे पर। घर आते ही बंद हो गया बाथरूम में। शावर से निकले पानी में धूल, पसीने की बदबू में लिपटा कुछ अरमान, दर्द के साथ बहने लगा। फ्रेश होकर बैडरूम में आया। सामने दीवार पर टंगे पोस्टर में लिखा चमक रहा था... "कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन् । "

औरत की इज्जत बनाम भैंस की चोरी

आदत से लाचार था। इंसान नहीं जानवर था। शायद जानवर से भी बदतर। औरत की इज्जत जैसे शब्द उसे समझ में ही नहीं आते थे। ३-३ रेप और १० से अधिक मामले सिर्फ छेड़खानी के दर्ज थे उसके नाम। पर किस्मत का धनी था। पुलिस और क़ानून उसे छू भी ना पाती थी या शायद छूना नहीं चाहती थी। लेकिन एक दिन किस्मत ने धोखा दे दिया । उसने एक भैंस चुराई और गलती से वो भैंस माननीय मंत्री जी की निकल आई। अब रेप मर्डर करता तो बात अलग थी पर मंत्री जी की भैंस खोलना माने सिस्टम को चुनौती देना था। सड़ रहा है आजकल वो जेल में।