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जुलाई, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

नायक

भीड़ के साथ ही जा रहा था वो। आसमानी नारे लगाते हुए। भीड़ बढ़ती ही जा रही थी। उसके नारों में एक  जोश था। लोग उसके दीवाने होने लगे। जाने कब भीड़ ने उसे रास्ता दे कर आगे खड़ा कर दिया। वो भी मतवाला बढे जा रहा था। अचानक उसने एक नजर भीड़ पर दौड़ायी। उसे लगा जैसे गंगोत्री की संकीर्ण स्वच्छ गंगा, विशालकाय गंदे सागर में बदल गयी हो। उसे एहसास हुआ की नियत अभी भी स्वच्छ है पर शायद दिशा गलत है। उसने दिशा बदली। अब वो भीड़ के उलटी दिशा में था। फिर हुआ यूँ की  उन्मादी भीड़ अपने पूर्व भीड़ नायक को कुचल कर निकल गयी।

आत्मसमर्पण

उन औरतों के अदम्य साहस और क्षमता को एक दिशा देकर नक्सली क्रांति की पट्टी पढाई गयी थी। जुल्म की दास्ताँ कानों में भर भर कर खड़ा किया गया था तथाकथित मुख्यधारा के खिलाफ। अगणित साथियों के क्षत- विक्षत लाश और बलात्कार से नुचे जिस्मों को देख भी विचलित नहीं हुयी थी वो अपनी राह से। लेकिन आज जाने क्या था उन गाँव की छोरियों के नाच में। रंग - बिरंगी तितली की भांति लहराती, बाहों में बाहें डाल डोलती लड़कियों को देख कर मन के कोने मे कुछ पिघलने लगा था। कंधे पर टंगे राइफल और गोलियों का भार अब असह्य सा लगने लगा था। सुबह अख़बार के मुख्य पृष्ठ पर कुछ नक्सलियों के आत्मसमर्पण की खबर थी।

आखिरी प्रेम सन्देश

"अक्सर लगता था कही दूर मुझे कोई आवाज दे रहा है। सुदूर किसी रेगिस्तान में, किसी पहाड़ी पर देवदार के झुरमुट से, दूर बहती नदी के उस ओर से जहाँ वो क्षितिज से जुड़ती है। पर जब तुम्हे देखा लगा वो आवाजे तुम्हारे ही इन गुलाब पंखुरी सदृश अधरों से निकली हुयी हो। ये प्रेम है या क्या है पता नहीं पर अब जब तुम चली गयी हो वो, आवाजें फिर से आने लगी हैं।" लिखते लिखते रुक गया अचानक से। ctrl+a और shift+delete दबा दिया। एक बार फिर से आखिरी प्रेम सन्देश अधूरा छूट गया... अधूरे प्रेम की तरह।

राजनीती

भैया जी दबंग ही नहीं थे ४ बार सांसद और दुइ बार मंत्री भी रह चुके थे। ऐसे तो भैया जी के लिए सब बराबर था। का हरिजन और का बामन। लेकिन ससुरा परमेशरा को तो अपना हरिजन का राजनीति करना था। तो भड़का दिया लोगन को " देखो अपना लोग ही समझ पायेगा हमरी पीड़ा को। पिछलग्गू बनना छोड़ के आगे लाओ अप्पन बिरादरी वाले को।" अब भैया जी को अपने हाथ से क्षेत्र और इज्जत दुनु निकलते दिख रहा था। तो ख़तम कर दिए ससुरा को। खुदे गोली मारे थे उहो दू बित्ता से मात्र। अब भैय्या जी को तो हो गयी जेल लेकिन विरासत सँभ ालने आ पहुंचा उनका विलायती बेटा। एकदम भैय्या जी का ट्रू कॉपी लगता है और दिमाग देखिये बबुआ का चुनाव परचार के लिए सबसे पाहिले परमेशरे के घर गया। ओकर बूढ़उ बाप के पैर धर के बोला " बाबूजी को फंसाया गया है अरे इ सब राजनीती है आप के बेटा को मरवा दिया और हम्मर बाप को फंसा दिया.. अब बाप जैसे हैं आप हम्मर...अब हमहि को परमेशर मानिये।" अब जो बेचारा जिनगी भर अप्पन छाँही को भी छुपा लेता था अइसन बड़का लोगन से एकदम से पसीज गया। "अरे कुंवर जी पाप न चढ़ाई हमके। हमर मन नहीं मानत है कि मालिक इ बूढ़ा के आँख छीन स...

एकहि साधे सब सधे, सब साधे सब जाय।

विद्यालय से शिक्षा पूर्ण करने जा रहे छात्रों में से शिक्षक ने दो सर्वश्रेष्ठ छात्रों को एकांत में बुलाया।  " तुम दोनों विज्ञानं , गणित, कला सब कुछ में अव्वल आते रहे हो। भविष्य में तुम किस विषय के साथ आगे बढ़ना चाहोगे। " पहले ने कहा " गुरु जी , मैं हर क्षेत्र में सफल होना चाहता हूँ। " दूसरे ने कहा " गुरु जी मैं विज्ञान अथवा कला में से एक को साधना चाहता हूँ। " गुरु जी ने दो पर्ची बनायीं और दोनों को थमा दिया।  दुसरे की पर्ची में लिखा था " यशस्वी भवः। सफलता तुम्हारे कदम चूमेगी " पहले की पर्ची में लिखा था " एकहि साधे सब सधे... सब साधे सब जाय। "