भीड़ के साथ ही जा रहा था वो। आसमानी नारे लगाते हुए। भीड़ बढ़ती ही जा रही थी। उसके नारों में एक जोश था। लोग उसके दीवाने होने लगे। जाने कब भीड़ ने उसे रास्ता दे कर आगे खड़ा कर दिया। वो भी मतवाला बढे जा रहा था। अचानक उसने एक नजर भीड़ पर दौड़ायी। उसे लगा जैसे गंगोत्री की संकीर्ण स्वच्छ गंगा, विशालकाय गंदे सागर में बदल गयी हो। उसे एहसास हुआ की नियत अभी भी स्वच्छ है पर शायद दिशा गलत है। उसने दिशा बदली। अब वो भीड़ के उलटी दिशा में था। फिर हुआ यूँ की उन्मादी भीड़ अपने पूर्व भीड़ नायक को कुचल कर निकल गयी।
लघुकथा अपने आप में एक सम्पूर्ण कथा होती है। इसे गागर में सागर कहें या फिर "देखन में छोटन लगे - घाव करे गंभीर " कहा जा सकता है।