जेठ की जलती दुपहरी में, पसीने से लथपथ रिक्शा वाला रेड लाइट के सामने खड़ा है। रेड लाइट के ग्रीन होते ही जैसे वो आगे को निकलता है एक SUV वाला रेड लाइट तोड़ के भागने के चक्कर में उसे ठोक देता है। रिक्शा का पहिया आगे से मुड़ जाता है। रिक्शा वाला गिर जाता है। SUV वाला एक 20 - 22 साल का लड़का निकालता है सर, सीसे से बाहर। एक मोटी सी गाली देता है और आगे निकल जाता है। रिक्शा वाला न तो उसकी गाडी की तरफ देखता है और ना ही उसे गाली सुनाई दे रही है। वो बस बैचैन सा कभी रिक्शा को द ेख रहा है तो कभी अपने पैर से निकल रहे खून को। कुछ बुदबुदा भी रहा है क्रोध में। लेकिन उतना स्पष्ट नहीं जितना SUV वाले की गाली स्पष्ट थी। मैं क्रासिंग पर सड़क पार करने के इंतजार में खड़ा देख रहा हूँ। एक 20-22 साल का निकम्मा, गैर जिम्मेदार लड़का कैसे 45-50 साल के एक वयस्क कर्मठ और जिम्मेदार नागरिक को कुचल के निकल जाता है। अक्सर इस तरह की चीजें दिख जाती है। बड़ा गुस्सा आता है पूंजीवादी व्यवस्था पर। हर बार की तरह इस बार भी थूक रहा हूँ गुस्से में इस पूंजीवादी व्यवस्था पर। लेकिन थूक के छींटें लौट के आ रही कुछ अपने ही चेहरे पर। कारण ...
लघुकथा अपने आप में एक सम्पूर्ण कथा होती है। इसे गागर में सागर कहें या फिर "देखन में छोटन लगे - घाव करे गंभीर " कहा जा सकता है।