सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

अक्टूबर, 2015 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मूर्तिकार

मूर्तिकार की व्यस्तता बता रही थी की दुर्गा पूजा काफी नजदीक आ चुकी है। महिषासुर और माता की अनेकों मूर्तियाँ विभिन्न आकर और रूपों में पड़ी थी। लेकिन एक मूर्ति कुछ ज्यादा ही भव्य बनके उभर रही थी। मूर्तिकार भी इधर उधर मिटटी चढ़ा के उसे और सुन्दर बनाने में लगा था। बीच बीच में आत्म मुग्ध होकर काफी देर तक निहारता भी रहता उस मूर्ति को।  रात हो चुकी थी। दिन भर के थकान को भूल अपनी ही धुन में लगा पड़ा था। जाने कब नींद आ गयी उसे। अचानक सपने में उसे वही मूर्ति मुस्कुराती नजर आई। सम्मोहित सा  खड़ा रहा वो। मूर्ति की मुस्कान और भी गहरी हो गयी। एक विचित्र सी आभा फैलने लगी चहुओर। घंटियों और शंखों की आवाज आने लगी ,अगरबत्ती और धूप का धुंआ जैसे फ़ैल गया था। फिर अचानक एक सैलाब आया पानी का। वो मूर्ती अब डूब रही थी, उसके रंग पानी में घुलने लगे थे। घंटियों और शंखों की आवाज और तेज़ हो गयी थी। देखते ही देखते मूर्ती गायब हो गयी। मूर्तिकार सपने में रोने लगा। फिर उसे लगा कोई उसके आंसू पोछ रहा है। गौर से देखा , अरे ये तो माँ है....जगत जननी नहीं बल्कि उसकी जननी।

रिश्तों की बैलेंस शीट

"अब हम इस रिश्ते को यहीं खत्म करते हैं" "क्यों ? कोई और मिल गई क्या ?" "नहीं । बस अब आत्मग्लानि सी होती है " "मेरे साथ सोने में तो नहीं हुई थी तुम्हें " "बकवास मत करो " "ओह ! तो उस बकवास का क्या..जो करके तुमने मुझे बरबाद कर दिया ।" "वो प्यार था मेरा ।" "तो वही कह रही मैं भी कि अब प्यार कहाँ गया " "तुमने अपने पति से क्यों मिलवाया मुझे?" "ये मेरे सवाल का जबाव नहीं है " "अगर ना मिलवाती तो मुझे उससे दोस्ती न होती । और अब वो दोस्त है तो मैं उसके साथ गद्दारी नहीं कर सकता " "तुम बात गोल गोल मत घुमाओ । मैं बस इतना जानती हूँ कि मेरा पति मेरे उपर समाज की थोपी गलती है और मैं बस तुमसे प्यार करती हूँ ।" "सुनो अगर मुझसे प्यार करती हो तो एक मदद करोगी " "हम्म्म् " "रिश्ते को रीओरगेनाइज करते हैं । हम तुम दोस्ती निभाते हैं और पति से तुम प्यार वाला रिश्ता निभा लो ।" "काश ये इतना आसान होता जैसे तुमने कह दिया। सी ऐ बाबू ये रिश्ते हैं आपका...