बाहर रद्दी वाला आवाज लगा रहा है "मैडम जल्दी करो कुछ रद्दी कागज़ है तो। " हाथ में फिर से वही खतों का बण्डल, आँख में वही खारा पानी। पूरे ३४० ख़त और ख़त में लिखी एक एक बातें ...ऐसा लगने लगा जैसे " वो " खुद यहाँ अपने ख़त को पढ़ के सुना रहा है। रद्दी शब्द से चौंक उठी वो। एक एक पल उसके प्रेम में बिताया रद्दी कैसे हो सकता है। लड़खड़ाते हुए उठी वो रद्दी वाले के सामने आयी। तौलने लगा उस बण्डल को रद्दी वाला। अचानक से वो बण्डल उठा लिया उसने अपने अंकुश में... सीने से लगा के चीख उठी... "रद्दी नहीं है ये। रद्दी नहीं है हो सकता है ये । " लेकिन तभी उसके सामने पति और बच्चे का चेहरा नाचने लगा। बरबस ही उसके मुह से आवाज आयी " हाँ रद्दी ही तो है ये ".....
लघुकथा अपने आप में एक सम्पूर्ण कथा होती है। इसे गागर में सागर कहें या फिर "देखन में छोटन लगे - घाव करे गंभीर " कहा जा सकता है।