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मार्च, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

पुष्प की अभिलाषा

पतझड़  में बिखरा हर फूल अपने में एक दास्ताँ समेटे था। भ्रमरों का दल जो कभी मधुमास में उन्मुक्त  रहता था पुष्प पराग पान में। अचानक से बदलते मौसम के साथ गिरते पुष्पों को देख गायब हो चला था। पुष्पों कि अभिलाषा ना तो यहाँ सुरबाला के गहनों में गूंथने कि थी , ना तो  देवो के सिर पर चढ़ने की और ना ही उस पथ पर गिरने की जहाँ से देश प्रेमी वीर गुजरते हों। पुष्प की अभिलाषा थी एक आखिरी मिलन की उन अगणित भ्रमरों से जिसने उसके अस्तित्व को सुवासित किया था। 

घुलते बदलते रंग

नौकरी की मजबूरी और स्वजनों से दूरी ने इस होली को बेरंग बना दिया था। बालकनी में चुपचाप सिगरेट के कश पे कश लगाये जा रहा था वो। तभी सामने एक टोली दिखी ४-५ लड़कियों की। उन्मुक्त भाव से एक दूसरे को रंग लगाती, ठहाके मारती। अचानक से एक खुशी कि तरंग दौड़ गयी उसके अंदर। गौर से देखने लगा वो चेहरे पे पुते हरे, लाल, पीले, नीले , गुलाबी रंग। धीरे धीरे गाढ़े होते जा रहे रंगो में उतरने लगा वो। फिर उसने देखा की इन रंगों से स्नेह और प्रेम की एक अदृस्य सी धारा निकल रही है जो समाहित कर रही है अनंत काल से चली आ रही अवधारणाएं जिसने औरतों का शोषण किया है । अचानक उसने महसूस किया कि रंग के कुछ छींटें उसके ऊपर भी आ गिरे हैं।  

फल अगर मौसम से पहले पक जाए तो फिर मीठा नहीं हो पाता है

" इतनी कड़वे-कसैले क्यूँ हो नीम कि तरह। बसंत तो वृद्धों में भी यौवन ला देता है और तुम युवा होके भी हर मौसम पतझड़ सा महसूस करते हो।"  "जानते हो कोई फल अगर मौसम से पहले पक जाए तो फिर मीठा नहीं हो पाता है। खट्टा ही रहता है।" "ओह्ह तो फिर से वही पुरानी घिसी पिटी प्रेम कहानी। अरे मान क्यूँ नहीं लेते वो बचपना था तुम्हारा। अरे तुम तो बादशाह ए चमन हो सकते हो और उलझे हो एक कली में। " "जानते हो जब भूख शांत हो जाती है तो छप्पन भोग भी आकर्षित नहीं कर पाता है। और ये तो रूहानी भूख है। इसे सिर्फ वही शांत कर सकता है जो … रहने दो तुम नहीं समझ सकते "

फेक प्रोफाइल

दो दिन से एक अजीब से अकाउंट से मेसेज आ रहा रहा था। मेसेज नहीं पढ़ा मैंने बस नाम देखा। एंजेल लव ऐसा ही कुछ नाम था। अरे इसी अकाउंट से तो फ्रेंड रिक्वेस्ट भी आया था.. मैं बुदबुदाया  " साले लोगों को क्या हो गया है। नाम लिखने में शर्म आती है। जरूर किसी लौंडे का फेक प्रोफाइल होगा। यार पता नहीं क्या मजा आता है लोगों को इसमें " कुछ देर बाद एक फ़ोन आया  "अबे सुमि ने तुम्हारा नंबर माँगा है। कॉल किया था उसने या नहीं ? बोल रही थी एफ बी पर तो जवाब ही नहीं देता है । अबे रिप्लाई कर दियो और हाँ एंजेल लव के नाम से प्रोफाइल है उसका " अचानक ही एक मुस्कान तैर गयी चेहरे पर

काश कोई अच्छा बहाना ढूंढा होता

काश कोई अच्छा बहाना ढूंढा होता ब्रेक उप के लिए। जानती हो तुम्हारे हाथ से खाये मोमोस का स्वाद आज तक नहीं ढूंढ़ पाया मैं , तुम्हारे हाथो से पिया वो वोडका विथ गुआवा जूस का स्वाद आजतक नहीं मिला किसी पेग में, तुम्हारे साथ बिताये हर लम्हे कि कहानी आजतक लिखता रहता हूँ लेकिन ना मैं थकता हूँ न ही मेरी लेखनी। काश ब्रेक उप का अच्छा बहाना ढूंढा होता तुमने जिससे मैं सच मान पाता और शुमार कर लेता अपनी प्रेम कहानी को अमर प्रेम कथा में। काश।

दो गला

"ऐ नेता जी एगो बात बताईये जरा सा भी शर्म नहीं आता है पार्टी बदले में। उहे गला से जिंदाबाद जिंदाबाद बोलते बोलते अचानके से मुर्दाबाद मुर्दाबाद कैसे बोल लेते हैं। दो गला तो नहीं है कहीं आपके पास। " "देखो बौआ का है कि अब जनते मूड बदल लेती है तो हमको भी तो फॉलो करना पड़ेगा ना जी। हैं तो आखिर जनता का सेवक ही न।"

कहानी हर बिन्नी की

चहकती मचलती बिन्नी... पापा की लाड़ली बिन्नी.. भैया की आन बिन्नी... घर की शान बिन्नी और शादी के बाद जब आयी तो बनके मेहमान बिन्नी....! (कहानी हर बिन्नी/औरत की..)

जब तक पेट ना भरी होगी आँचल में ढूध ना भर पायेगा

कोयले के पत्थर पर हथोड़े चलाते हुए उसे ऐसा लग रहा था मानो अपने निष्ठुर नियति की कालिमा को वो चीरने का प्रयत्न कर रही हो। सर से टपके पसीने कि बूँद उसके कान के पिछले हिस्से से होती हुयी पीठ पर पहुंच एक झुंझलाहट भर रही थी उसके अंदर। सोचा इतने कष्ट को सहने से अच्छा है छुधा कि पीड़ा को ही सह ले लेकिन तभी आँखें अटक गयी अपने अबोध बच्चे पर। और याद आ गयी अम्मा कि वो बात " जब तक पेट ना भरी होगी आँचल में ढूध ना भर पायेगा " और जाने कहाँ से एक अजीब साहस आ गया उसके अंदर। दोगुने रफ़्तार से हथोड़ा चलाने लगी वो पत्थरों पर।