पतझड़ में बिखरा हर फूल अपने में एक दास्ताँ समेटे था। भ्रमरों का दल जो कभी मधुमास में उन्मुक्त रहता था पुष्प पराग पान में। अचानक से बदलते मौसम के साथ गिरते पुष्पों को देख गायब हो चला था। पुष्पों कि अभिलाषा ना तो यहाँ सुरबाला के गहनों में गूंथने कि थी , ना तो देवो के सिर पर चढ़ने की और ना ही उस पथ पर गिरने की जहाँ से देश प्रेमी वीर गुजरते हों। पुष्प की अभिलाषा थी एक आखिरी मिलन की उन अगणित भ्रमरों से जिसने उसके अस्तित्व को सुवासित किया था।
लघुकथा अपने आप में एक सम्पूर्ण कथा होती है। इसे गागर में सागर कहें या फिर "देखन में छोटन लगे - घाव करे गंभीर " कहा जा सकता है।