पतझड़ में बिखरा हर फूल अपने में एक दास्ताँ समेटे था। भ्रमरों का दल जो कभी मधुमास में उन्मुक्त रहता था पुष्प पराग पान में। अचानक से बदलते मौसम के साथ गिरते पुष्पों को देख गायब हो चला था। पुष्पों कि अभिलाषा ना तो यहाँ सुरबाला के गहनों में गूंथने कि थी , ना तो देवो के सिर पर चढ़ने की और ना ही उस पथ पर गिरने की जहाँ से देश प्रेमी वीर गुजरते हों। पुष्प की अभिलाषा थी एक आखिरी मिलन की उन अगणित भ्रमरों से जिसने उसके अस्तित्व को सुवासित किया था।
मूर्तिकार की व्यस्तता बता रही थी की दुर्गा पूजा काफी नजदीक आ चुकी है। महिषासुर और माता की अनेकों मूर्तियाँ विभिन्न आकर और रूपों में पड़ी थी। लेकिन एक मूर्ति कुछ ज्यादा ही भव्य बनके उभर रही थी। मूर्तिकार भी इधर उधर मिटटी चढ़ा के उसे और सुन्दर बनाने में लगा था। बीच बीच में आत्म मुग्ध होकर काफी देर तक निहारता भी रहता उस मूर्ति को। रात हो चुकी थी। दिन भर के थकान को भूल अपनी ही धुन में लगा पड़ा था। जाने कब नींद आ गयी उसे। अचानक सपने में उसे वही मूर्ति मुस्कुराती नजर आई। सम्मोहित सा खड़ा रहा वो। मूर्ति की मुस्कान और भी गहरी हो गयी। एक विचित्र सी आभा फैलने लगी चहुओर। घंटियों और शंखों की आवाज आने लगी ,अगरबत्ती और धूप का धुंआ जैसे फ़ैल गया था। फिर अचानक एक सैलाब आया पानी का। वो मूर्ती अब डूब रही थी, उसके रंग पानी में घुलने लगे थे। घंटियों और शंखों की आवाज और तेज़ हो गयी थी। देखते ही देखते मूर्ती गायब हो गयी। मूर्तिकार सपने में रोने लगा। फिर उसे लगा कोई उसके आंसू पोछ रहा है। गौर से देखा , अरे ये तो माँ है....जगत जननी नहीं बल्कि उसकी जननी।