पतझड़ में बिखरा हर फूल अपने में एक दास्ताँ समेटे था। भ्रमरों का दल जो कभी मधुमास में उन्मुक्त रहता था पुष्प पराग पान में। अचानक से बदलते मौसम के साथ गिरते पुष्पों को देख गायब हो चला था। पुष्पों कि अभिलाषा ना तो यहाँ सुरबाला के गहनों में गूंथने कि थी , ना तो देवो के सिर पर चढ़ने की और ना ही उस पथ पर गिरने की जहाँ से देश प्रेमी वीर गुजरते हों। पुष्प की अभिलाषा थी एक आखिरी मिलन की उन अगणित भ्रमरों से जिसने उसके अस्तित्व को सुवासित किया था।
" आज -कल वो गुरु-शिष्य परंपरा नहीं रही "- कहते हुए डॉ रमनन ने सिगरेट सुलगाई ... अब छात्रों से वो इज्जत कहा मिलती है teachers को ....! '' Sir Time has changed ..अब छात्र विद्या अर्जन करने नहीं बल्कि खरीदने आते हैं " " Yes Mohit - खैर मुझे क्या करना है इन बातों का .....Forget those things ...अब ये teachers का जो खम्भा बचा है उसे भी तो ख़तम करना है .... " मोहित आज्ञाकारी छात्र की तरह तन्मयता से गुरु आज्ञा पालन में लग गया ........