नौकरी की मजबूरी और स्वजनों से दूरी ने इस होली को बेरंग बना दिया था। बालकनी में चुपचाप सिगरेट के कश पे कश लगाये जा रहा था वो। तभी सामने एक टोली दिखी ४-५ लड़कियों की। उन्मुक्त भाव से एक दूसरे को रंग लगाती, ठहाके मारती। अचानक से एक खुशी कि तरंग दौड़ गयी उसके अंदर। गौर से देखने लगा वो चेहरे पे पुते हरे, लाल, पीले, नीले , गुलाबी रंग। धीरे धीरे गाढ़े होते जा रहे रंगो में उतरने लगा वो। फिर उसने देखा की इन रंगों से स्नेह और प्रेम की एक अदृस्य सी धारा निकल रही है जो समाहित कर रही है अनंत काल से चली आ रही अवधारणाएं जिसने औरतों का शोषण किया है । अचानक उसने महसूस किया कि रंग के कुछ छींटें उसके ऊपर भी आ गिरे हैं।
" आज -कल वो गुरु-शिष्य परंपरा नहीं रही "- कहते हुए डॉ रमनन ने सिगरेट सुलगाई ... अब छात्रों से वो इज्जत कहा मिलती है teachers को ....! '' Sir Time has changed ..अब छात्र विद्या अर्जन करने नहीं बल्कि खरीदने आते हैं " " Yes Mohit - खैर मुझे क्या करना है इन बातों का .....Forget those things ...अब ये teachers का जो खम्भा बचा है उसे भी तो ख़तम करना है .... " मोहित आज्ञाकारी छात्र की तरह तन्मयता से गुरु आज्ञा पालन में लग गया ........
