कोयले के पत्थर पर हथोड़े चलाते हुए उसे ऐसा लग रहा था मानो अपने निष्ठुर नियति की कालिमा को वो चीरने का प्रयत्न कर रही हो। सर से टपके पसीने कि बूँद उसके कान के पिछले हिस्से से होती हुयी पीठ पर पहुंच एक झुंझलाहट भर रही थी उसके अंदर। सोचा इतने कष्ट को सहने से अच्छा है छुधा कि पीड़ा को ही सह ले लेकिन तभी आँखें अटक गयी अपने अबोध बच्चे पर। और याद आ गयी अम्मा कि वो बात " जब तक पेट ना भरी होगी आँचल में ढूध ना भर पायेगा " और जाने कहाँ से एक अजीब साहस आ गया उसके अंदर। दोगुने रफ़्तार से हथोड़ा चलाने लगी वो पत्थरों पर।
लघुकथा अपने आप में एक सम्पूर्ण कथा होती है। इसे गागर में सागर कहें या फिर "देखन में छोटन लगे - घाव करे गंभीर " कहा जा सकता है।

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