वो रोज मेरा गरदन दबाने आता था । भीड़ भाड़ में मेरे सर पे लटका रहता । पर अकेले में जब भी मैं होता वो मेरा गरदन दबाने लगता । कई दफा मैंने उससे पीछा छूड़ाने की कोशिश की । लेकिन हर बार मैं हार जाता । दरअसल उसकी आदत हो चुकी थी मुझे । मैंने खुद उसे सर पे बिठा रख्खा था । एक दिन मुझे लगा आज मुझे वो मार ही डालेगा । दर्द असह्य था और जीना मुश्किल । आखिरकार हिम्मत करके मैंने उसका गला दबा दिया ।
अब मेरा अरमान मर चुका था । वो अरमान जिसने मेरा जीना मुश्किल कर रख्खा था । अब मैं जी सकता था । लेकिन हुआ उल्टा । अरमान के मरते ही मैं भी मर चुका था । अब शरीर बचा था, मैं काफी हल्का महसूस कर रहा था लेकिन जान नहीं थी ।
अब मेरा अरमान मर चुका था । वो अरमान जिसने मेरा जीना मुश्किल कर रख्खा था । अब मैं जी सकता था । लेकिन हुआ उल्टा । अरमान के मरते ही मैं भी मर चुका था । अब शरीर बचा था, मैं काफी हल्का महसूस कर रहा था लेकिन जान नहीं थी ।