
मेट्रो का दरवाजा बंद होते ही मैंने देखा एक टिड्डा अंदर घुस गया था । ठसाठस भरे मेट्रो में कोने में खड़ा मैं उसके एक्टिविटी को देखने लगा । शायद किसी और ने नोटिस किया नहीं था । टिड्डा पहले तो वाल पे रास्ता ढूँढ़ता रहा फिर एक के सर पर जाके बैठ गया । वो कान में हेडफोन लगाये गाना सुन रहा था और सर हिला रहा था । टिड्डा भी मानो झूला झूल रहा हो । उसके स्पाइक्स वाले बालों पर चलते चलते अब टिड्डा दूसरे सर पर आ चुका था । दूसरे बंदे ने अचानक सर हिलाया और टिड्डा जाके एक मैडम के गोद में जा गिरा । मैडम चिल्ला उठी और अपना पल्लू झटक दिया । अब तो लोगों में हलचल मच गयी, टिड्डा इधर से उधर फेंका जा रहा था । मेरे मन में बैचैनी होने लगी । इत्ते देर से टिड्डे को देखते देखते एक लगाव हो गया था । अचानक एक सभ्य सी दिखने वाली मैडम ने अपने बैग से टिड्डे को मारना शुरू किया । टिड्डा धाराशायी हो गया ।
मैं चिल्ला उठा : -
"अबे क्यों मार दी..इसने क्या बिगाड़ा था तेरा ।"
जाने मुझे क्या हो गया था, मैं नर्वस जैसा हो गया था। कानों में आवाज आ रही थी :
" भाई तू क्यों परेशान हो रहा है, तेरा पालतू था क्या?? " फिर हँसने की आवाज ।
मैं परेशान सा, औरों की बातों से अनजान सा उतर गया नेक्स्ट स्टेशन पर ।
दो दिन बीत गये पर आज भी वो टिड्डा आँखों में है ।