जमीं की जकड़न कम हो रही थी। उसे दुनिया से जोड़ने वाली जड़ें काटी जा रही थी। दुखों ने निष्ठुर बना दिया था जमीं को। अब उसे दुनिया के जीव पराये लगने लगे थे। फिर एक जलजला आया। सृष्टि की सारी रचना एक अवस्था में आ चुकी थी। एक विशाल दलदल की चादर फ़ैल गयी थी जमीन के ऊपर। जैसे अनेक धातुओं को पिघला कर एक साथ फैला दिया गया हो। किन्तु सारी रचनाओं को नष्ट कर सृष्टि नीरस हो चुकी थी।
कुछ दिनों बाद दूर कही जमीं में हलचल हुयी। एक पौधा जमीन के सीने पर जनम ले रही थी। सृष्टि अपने पुनर्निर्माण में फिर से लग गयी थी।
कुछ दिनों बाद दूर कही जमीं में हलचल हुयी। एक पौधा जमीन के सीने पर जनम ले रही थी। सृष्टि अपने पुनर्निर्माण में फिर से लग गयी थी।
