सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

क से कहानी


एक गरीब टाइप वृद्ध को अखबार पढ़ते देख लेखक का मन उद्वेलित हो गया । सोचने लगा पूछ लूँ कुछ इनसे, क्या पता कुछ कहानी ही हाथ लग जाये ।
"बाबा क्या पढ़ रहे अखबार में ?"
"वही जो लिख्खा है इसमें " अनमने ढंग से जवाब आया ।
लेखक चुप हो गया सुन कर। सोचा अड़ियल है बुढ़ढा । कबर में पैर है, गरीबी की चादर तले बैठा है, लेकिन अकड़ नहीं जा रही । पर कोई नहीं ; फोटो ले लेता हूँ इसकी । दर्द भरी कहानी तो बहुत सी बन जाएगी ।
अब लेखक कहानी सोचने लगा " पुत्र द्वारा प्रताड़ित पिता...राजनीति के गिरते स्तर को देखता एक सच्चा समाजसेवी... "बंद हुए चीनी मिल" के संबंध में खबर पढ़ता हुआ एक वृद्ध जो इसके बंद होने से बेरोजगार हो गया था ...पेपर में अपना नाम और फोटो ढूंढ़ता वृद्ध... रोजगार वाले कॉलम में अपने बेटे के लिए नौकरी ढूंढता वृद्ध....ब्ला ब्ला ब्ला।
तभी बुजुर्ग की आवाज आई :
"का टकटकी लगाये हो.. पेपर पढ़ना है। ये लो। वैसे भी मोहल्ले में सब मुफ्त का ही पेपर पढता है। एक मेरा मनोहरवा ही गधा है जो पेपर खरीद कर पढता है।"
लेखक साहब सन्न थे। दिमाग भनभना रहा था। पेपर हाथ में पकडे चुपचाप नया कहानी सोचने लगे।

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मूर्तिकार

मूर्तिकार की व्यस्तता बता रही थी की दुर्गा पूजा काफी नजदीक आ चुकी है। महिषासुर और माता की अनेकों मूर्तियाँ विभिन्न आकर और रूपों में पड़ी थी। लेकिन एक मूर्ति कुछ ज्यादा ही भव्य बनके उभर रही थी। मूर्तिकार भी इधर उधर मिटटी चढ़ा के उसे और सुन्दर बनाने में लगा था। बीच बीच में आत्म मुग्ध होकर काफी देर तक निहारता भी रहता उस मूर्ति को।  रात हो चुकी थी। दिन भर के थकान को भूल अपनी ही धुन में लगा पड़ा था। जाने कब नींद आ गयी उसे। अचानक सपने में उसे वही मूर्ति मुस्कुराती नजर आई। सम्मोहित सा  खड़ा रहा वो। मूर्ति की मुस्कान और भी गहरी हो गयी। एक विचित्र सी आभा फैलने लगी चहुओर। घंटियों और शंखों की आवाज आने लगी ,अगरबत्ती और धूप का धुंआ जैसे फ़ैल गया था। फिर अचानक एक सैलाब आया पानी का। वो मूर्ती अब डूब रही थी, उसके रंग पानी में घुलने लगे थे। घंटियों और शंखों की आवाज और तेज़ हो गयी थी। देखते ही देखते मूर्ती गायब हो गयी। मूर्तिकार सपने में रोने लगा। फिर उसे लगा कोई उसके आंसू पोछ रहा है। गौर से देखा , अरे ये तो माँ है....जगत जननी नहीं बल्कि उसकी जननी।

~ एक झूठी सी आशा ~

जंग लगे उस ताले की चाभी बहुत पहले खो चुकी थी। कुछ प्रयास हुआ उस ताले को तोड़ने का और चाभी ढूंढने का भी । पर शायद किसी के बस में नहीं था कि वर्षों से लगा वो ताला खुल जाए। लेकिन कुदरत की कुछ और ही चाह थी। जाने कहाँ से एक पौधा पनप गया था उस ताले में। अब एक संघर्ष था उस बेरंग ताले और खूबसूरत पौधे के बीच। संघर्ष अपने अस्तित्व बचाने की। ताले के जंग ने पौधे के जड़ को खाने की बहुत कोशिश की। लेकिन हर कहानी की तरह इस बार भी जीत अच्छाई की हुयी, ताला टूट गया। कश्मीर से आतंकवाद का ताला टूट चूका था, बुरहान वानी जैसे कितने जंग के छोटे - छोटे टुकड़े मिटटी में दफ़न हो गए थे, शांति की हरियाली धरती के जन्नत में एक बार फिर से फ़ैल गई थी।

गुरु-शिष्य परंपरा

" आज -कल वो गुरु-शिष्य परंपरा नहीं रही "- कहते हुए डॉ रमनन ने सिगरेट सुलगाई ... अब छात्रों से वो इज्जत कहा मिलती है teachers को ....! '' Sir Time has changed ..अब छात्र विद्या अर्जन करने नहीं बल्कि खरीदने आते हैं " " Yes Mohit - खैर मुझे क्या करना है इन बातों का .....Forget those things ...अब ये teachers का जो खम्भा बचा है उसे भी तो ख़तम करना है .... " मोहित आज्ञाकारी छात्र की तरह तन्मयता से गुरु आज्ञा पालन में लग गया ........