दो दिन पहले ही गेटकीपर बोल रहा था" अब का बताएँ सर..गरमी इतनी है कि सो नहीं पाते हैं रात को.."
मुझे याद आ गया बचपन में कहीं पढ़ा था " गरमी गरीबों की, सर्दी अमीरों का .."
लगा जैसे शहरी गरीब की परिकल्पना ही नहीं की होगी लेखक ने उस समय।
अब तो "गरमी और सर्दी दोनों ही अमीरों का है।" फिर मन में ख्याल आया बारिश हो जाए तो सब के लिए भला होगा। अमीरो का एयरकंडीशन का बिल बचेगा। और गरीब बेचारे सुकून से सो पाएंगे रात में। खैर आज बारिश भी हुयी जम के।
गेटकीपर बाबू लाल को देखते ही मैं पूछ बैढा
" क्यों बाबू भैय्या । आज तो सोये होंगे अच्छी तरह। बारिश ने तो काफी राहत दिला दी है।"
बाबू थोड़ी बेबसी में थोड़ी सी उग्रता मिलाकर बोला
"कहाँ सर । रात भर झुग्गी चू रही थी सो अलग उपर से सुबह तक घर में नाले का पानी घुस आया था।"
अब मैं क्या बोलता। थोड़ी बहुत सांत्वना दे के कट लिया वहाँ से।
मन व्यथित हो गया था । लगा जैसे गर्मी और सर्दी की तरह बरसात भी अमीरों के लिए ही बनायीं गयी हो।