सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

आप भी समझते नहीं हैं , हर बात पे दोनों बाप बेटा लड़ लेते हैं

"आप भी समझते नहीं हैं , हर बात पे दोनों बाप बेटा लड़ लेते हैं। "
"अरे मैं कहा लड़ता हूँ।  मैं तो बस उससे कुछ देर बात करना चाहता हूँ। आखिर जिसके लिए अपनी पूरी जिंदगी लगा दी मैंने।  उससे दो मिनट बात भी नहीं कर सकता।"
"पर आप तो जानते हैं ना आजकल के बच्चे।  माँ बाप का जरा सा भी हस्तक्षेप बर्दास्त नहीं कर पाते।"
"बिट्टू की माँ याद है न, ऑफिस से थका हारा आता था फिर भी इसे रोज घुमाने ले जाता था शाम को।"
"बिट्टू के पापा, एक बात कहूँ। बुरा तो नहीं मानोगे??"
"बोलो "
"याद है आप
रोज बिट्टू को तो पार्क घुमाने ले जाते थे।  पर बिट्टू के दादा जी सुबह से आपका इन्तेजार कर रहे होते थे, और आपके पास समय नहीं होता था उनसे बात करने का। मानती हूँ आप गलत नहीं थे इसलिए ये भी मानती हूँ की बिट्टू भी गलत नहीं। "
"नहीं बिट्टू की माँ। मैं गलत था और शायद बिट्टू भी है।"

दोनों खामोश थे अब। 

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मूर्तिकार

मूर्तिकार की व्यस्तता बता रही थी की दुर्गा पूजा काफी नजदीक आ चुकी है। महिषासुर और माता की अनेकों मूर्तियाँ विभिन्न आकर और रूपों में पड़ी थी। लेकिन एक मूर्ति कुछ ज्यादा ही भव्य बनके उभर रही थी। मूर्तिकार भी इधर उधर मिटटी चढ़ा के उसे और सुन्दर बनाने में लगा था। बीच बीच में आत्म मुग्ध होकर काफी देर तक निहारता भी रहता उस मूर्ति को।  रात हो चुकी थी। दिन भर के थकान को भूल अपनी ही धुन में लगा पड़ा था। जाने कब नींद आ गयी उसे। अचानक सपने में उसे वही मूर्ति मुस्कुराती नजर आई। सम्मोहित सा  खड़ा रहा वो। मूर्ति की मुस्कान और भी गहरी हो गयी। एक विचित्र सी आभा फैलने लगी चहुओर। घंटियों और शंखों की आवाज आने लगी ,अगरबत्ती और धूप का धुंआ जैसे फ़ैल गया था। फिर अचानक एक सैलाब आया पानी का। वो मूर्ती अब डूब रही थी, उसके रंग पानी में घुलने लगे थे। घंटियों और शंखों की आवाज और तेज़ हो गयी थी। देखते ही देखते मूर्ती गायब हो गयी। मूर्तिकार सपने में रोने लगा। फिर उसे लगा कोई उसके आंसू पोछ रहा है। गौर से देखा , अरे ये तो माँ है....जगत जननी नहीं बल्कि उसकी जननी।

~ एक झूठी सी आशा ~

जंग लगे उस ताले की चाभी बहुत पहले खो चुकी थी। कुछ प्रयास हुआ उस ताले को तोड़ने का और चाभी ढूंढने का भी । पर शायद किसी के बस में नहीं था कि वर्षों से लगा वो ताला खुल जाए। लेकिन कुदरत की कुछ और ही चाह थी। जाने कहाँ से एक पौधा पनप गया था उस ताले में। अब एक संघर्ष था उस बेरंग ताले और खूबसूरत पौधे के बीच। संघर्ष अपने अस्तित्व बचाने की। ताले के जंग ने पौधे के जड़ को खाने की बहुत कोशिश की। लेकिन हर कहानी की तरह इस बार भी जीत अच्छाई की हुयी, ताला टूट गया। कश्मीर से आतंकवाद का ताला टूट चूका था, बुरहान वानी जैसे कितने जंग के छोटे - छोटे टुकड़े मिटटी में दफ़न हो गए थे, शांति की हरियाली धरती के जन्नत में एक बार फिर से फ़ैल गई थी।

गुरु-शिष्य परंपरा

" आज -कल वो गुरु-शिष्य परंपरा नहीं रही "- कहते हुए डॉ रमनन ने सिगरेट सुलगाई ... अब छात्रों से वो इज्जत कहा मिलती है teachers को ....! '' Sir Time has changed ..अब छात्र विद्या अर्जन करने नहीं बल्कि खरीदने आते हैं " " Yes Mohit - खैर मुझे क्या करना है इन बातों का .....Forget those things ...अब ये teachers का जो खम्भा बचा है उसे भी तो ख़तम करना है .... " मोहित आज्ञाकारी छात्र की तरह तन्मयता से गुरु आज्ञा पालन में लग गया ........