"ये रोज यहाँ स्टेशन पर आते हैं । बिलकुल उसी समय पर जब ट्रेन आती है ।बात क्या है गंगाधर ? "
नये स्टेशन मास्टर ने चाय वाले से पूछा ।
"कोइ नहीं है बाबा का.. बेटा था एक । शहर गया पर लौट के ना आया । बेटे के आने की उम्मीद ही है जो सालों से रोज खिंच लाती है उन्हें ।"
" पर उनके बेटे को हुआ क्या ?"
" अब का जानें सरकार, शहर निगल गया शायद ! हरिया बता रहा था कि शहर में रोज लावारिश लाशें मिलती....।" पूरा बोल नहीं पाया गंगूआ ।
अगले दिन से स्टेशन मास्टर बाबा को रोज अंदर बुला लेते अपने केबिन में । अब तो काफी अपनापन सा हो गया था उनके बीच ।
एक दिन कुछ इधर उधर की बातों के बाद वो बाबा से बोले " बाबा कब तक इंतजार करते रहेंगे। निराश नहीं करना चाहता आपको लेकिन बाबा कुछ परिंदे लौट के कभी नहीं आते ।"
बाबा मुस्कुराये । एक गहरी सांस लेकर बोले " बेटा सब को लगता है मैं अपने बेटे की आस में यहाँ आता हूँ । लेकिन सच तो ये है कि वो आस तो कब की टूट गयी । अब तो बस आदत हो गयी है आने वाले मुसाफिर को देख कर खुश होने की । ऐसा लगता है मानो कलेजे को ठंढक सी मिल गइ हो ।"
स्टेशन मास्टर अवाक थे । बाबा निकल गये वहाँ से ।कल फिर आना है उन्हें ।
