इंसान पशुता की गहरी खायी लांघ होमोसेपियन्स बनने के कगार पर था। अब उसने समझना शुरू किया था एक निश्चित अंतराल लगभग 70-80 साल का ही समय है उसके पास। फिर उसने दौड़ लगनी शुरू की समय के साथ। पर वो थकता, गिरता और संभालता लेकिन समय तो एक निश्चित वेग में भाग रहा था। कई पीढ़ी इंसानों की ऐसे ही समय आगे बेबस हो कर विदा हो गयी इस दुनिया से। फिर अचानक एक इंसान ने समय के साथ इस दौड़ को ध्यान से देखने की कोशिश की। गहरे ध्यान में उसने पाया की समय तो वही है दौड़ तो इंसान रहा है बस। बस उस दिन से उसके पास समय ही समय था। शायद पहला बुद्ध था वो अनाम इंसान।
" आज -कल वो गुरु-शिष्य परंपरा नहीं रही "- कहते हुए डॉ रमनन ने सिगरेट सुलगाई ... अब छात्रों से वो इज्जत कहा मिलती है teachers को ....! '' Sir Time has changed ..अब छात्र विद्या अर्जन करने नहीं बल्कि खरीदने आते हैं " " Yes Mohit - खैर मुझे क्या करना है इन बातों का .....Forget those things ...अब ये teachers का जो खम्भा बचा है उसे भी तो ख़तम करना है .... " मोहित आज्ञाकारी छात्र की तरह तन्मयता से गुरु आज्ञा पालन में लग गया ........
