इंसान पशुता की गहरी खायी लांघ होमोसेपियन्स बनने के कगार पर था। अब उसने समझना शुरू किया था एक निश्चित अंतराल लगभग 70-80 साल का ही समय है उसके पास। फिर उसने दौड़ लगनी शुरू की समय के साथ। पर वो थकता, गिरता और संभालता लेकिन समय तो एक निश्चित वेग में भाग रहा था। कई पीढ़ी इंसानों की ऐसे ही समय आगे बेबस हो कर विदा हो गयी इस दुनिया से। फिर अचानक एक इंसान ने समय के साथ इस दौड़ को ध्यान से देखने की कोशिश की। गहरे ध्यान में उसने पाया की समय तो वही है दौड़ तो इंसान रहा है बस। बस उस दिन से उसके पास समय ही समय था। शायद पहला बुद्ध था वो अनाम इंसान।
मूर्तिकार की व्यस्तता बता रही थी की दुर्गा पूजा काफी नजदीक आ चुकी है। महिषासुर और माता की अनेकों मूर्तियाँ विभिन्न आकर और रूपों में पड़ी थी। लेकिन एक मूर्ति कुछ ज्यादा ही भव्य बनके उभर रही थी। मूर्तिकार भी इधर उधर मिटटी चढ़ा के उसे और सुन्दर बनाने में लगा था। बीच बीच में आत्म मुग्ध होकर काफी देर तक निहारता भी रहता उस मूर्ति को। रात हो चुकी थी। दिन भर के थकान को भूल अपनी ही धुन में लगा पड़ा था। जाने कब नींद आ गयी उसे। अचानक सपने में उसे वही मूर्ति मुस्कुराती नजर आई। सम्मोहित सा खड़ा रहा वो। मूर्ति की मुस्कान और भी गहरी हो गयी। एक विचित्र सी आभा फैलने लगी चहुओर। घंटियों और शंखों की आवाज आने लगी ,अगरबत्ती और धूप का धुंआ जैसे फ़ैल गया था। फिर अचानक एक सैलाब आया पानी का। वो मूर्ती अब डूब रही थी, उसके रंग पानी में घुलने लगे थे। घंटियों और शंखों की आवाज और तेज़ हो गयी थी। देखते ही देखते मूर्ती गायब हो गयी। मूर्तिकार सपने में रोने लगा। फिर उसे लगा कोई उसके आंसू पोछ रहा है। गौर से देखा , अरे ये तो माँ है....जगत जननी नहीं बल्कि उसकी जननी।
