"भीड़ है। मैं हूँ तुम हो। अब तो मैं और तुम हम हो गए हैं। भीड़ चल रही है। हम भी तो चल रहे हैं भीड़ के साथ। लेकिन ऐसा क्यों लगता है उड़ रहे हैं हम। इश्क़ का असर है शायद। अच्छा कभी गौर से देखो तो लगेगा हर शख्स उड़ रहा है। शरीर जमीं पर है लेकिन इश्क़ ने जैसे उठा रखा है सबके रूह को ऊपर। उस से कुछ ही ऊपर तो खुदा का दर है। देखो ना , इश्क़ का रंग जिसका जितना गहरा हो रहा है रूह उतनी ऊँची उठ रही है। तुम देख रही हो ना..?""उम्म... हुम्म.... देखो ये आखिरी पेग था। अब हमें सो जाना चाहिए। तुम क्या बोल रहे हो मैं कुछ नहीं समझ पा रही हूँ। गुड नाईट...लव यू। "