रोज़ सब वे पर बैठा हुआ दिखता है वो बुड्ढा। फटे हुए चद्दर में खुद को किसी तरह ढँकता हुआ। आने जाने वाले हर एक की तरफ कातर निगाह से देखता है। कुछ बड़बड़ाता है। भगवन भला करेगा बेटा.. मैं इतना ही सुन पाता हूँ। दिल्ली कि सर्दी अपना क्रूरतम रूप दिखा रही है। मोटे कम्बल के नीचे सपने भी अच्छे आते हैं। लेकिन कल सपने में वही बुड्ढ़ा नजर आया। सुबह ही सोच लिया था कि पुराना कम्बल उसे दे आउंगा। सुबह उठते ही कम्बल को पैक किया। सबवे के पास मेरी निगाह उसे ढूंढने लगी। लेकिन ये क्या आज वो भिखारी नजर नहीं आया। मैं थोड़ी दूर भटका, लेकिन वो नदारद था। मैं ऑफिस के लिए लेट हो रहा था। अपना कम्बल उठाया और दूर बस स्टॉप पर बैठे एक भिखारी को दे आया। अगले दिन सबवे पर फिर से वही भिखारी नजर आ गया। ठंढ से ठिठुरता खुद को एक चादर में छुपाते हुए। अब मुझे किस्मत पे यकीन होने लगा था।
मूर्तिकार की व्यस्तता बता रही थी की दुर्गा पूजा काफी नजदीक आ चुकी है। महिषासुर और माता की अनेकों मूर्तियाँ विभिन्न आकर और रूपों में पड़ी थी। लेकिन एक मूर्ति कुछ ज्यादा ही भव्य बनके उभर रही थी। मूर्तिकार भी इधर उधर मिटटी चढ़ा के उसे और सुन्दर बनाने में लगा था। बीच बीच में आत्म मुग्ध होकर काफी देर तक निहारता भी रहता उस मूर्ति को। रात हो चुकी थी। दिन भर के थकान को भूल अपनी ही धुन में लगा पड़ा था। जाने कब नींद आ गयी उसे। अचानक सपने में उसे वही मूर्ति मुस्कुराती नजर आई। सम्मोहित सा खड़ा रहा वो। मूर्ति की मुस्कान और भी गहरी हो गयी। एक विचित्र सी आभा फैलने लगी चहुओर। घंटियों और शंखों की आवाज आने लगी ,अगरबत्ती और धूप का धुंआ जैसे फ़ैल गया था। फिर अचानक एक सैलाब आया पानी का। वो मूर्ती अब डूब रही थी, उसके रंग पानी में घुलने लगे थे। घंटियों और शंखों की आवाज और तेज़ हो गयी थी। देखते ही देखते मूर्ती गायब हो गयी। मूर्तिकार सपने में रोने लगा। फिर उसे लगा कोई उसके आंसू पोछ रहा है। गौर से देखा , अरे ये तो माँ है....जगत जननी नहीं बल्कि उसकी जननी।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें