धक् धक् धक् धक्। ट्रेन की तरह दिल धड़क रहा था। आज एक दशक बाद उसे देखने वाला था। मिलन के बाद विरह और विरह के बाद फिर से मिलन। प्रेम की सम्पूर्णता का एहसास उसके दिल को रोमांचित कर रहा था
मिलन के दिन यूँ तो बमुश्किल १० ही थे लेकिन एक एक दिन की गाथा में महाकाव्य रचा जा सकता था। उसके बाद के हिज्र के दिनों में बस दर्द और वियोग की भावनाओं का पराकाष्ठा था। प्रेम जीवन के रात्रि समान इन काले वर्षो में एक मात्र उससे मिलने की उम्मीद की रौशनी ने उसे जीवित रख्खा था। मन आँगन में उसकी जमी हुयी मूर्ति को रोज़ याद रूपी सुनहले पोछे से वो चमकाया करता था.।
तभी दूर से आती हुयी दिखी वो। अब तो धड़कन शताब्दी की रफ़्तार पकड़ चुकी थी। लेकिन ज्यों ज्यों वो पास आने लगी। उसके मांग की सिंदूर और गले का मंगलसूत्र बिलकुल स्पष्ठ दिखने लगा.। धड़कन अब मंथर हो गयी थी। सिन्दूर का रंग चुभने लगा उसे, रंग और गाढ़ा हो चला था। मांग में फैला सिंदूर उसे अपने चारो ओर उड़ता हुआ दिखने लगा था। मन में छाये इस सिन्दूरी बवंडर में प्रेम कही खोने लगा था। खुद को सम्भाला उसने।गौर से देखने लगा उसकी सूरत को। अनजाना सा लगा वो चेहरा। आँखें बंद की मन आँगन में स्थापित मूर्ति अभी भी वैसी की वैसी ही थी अक्षत।चुप चाप उठ के चल पड़ा वो अपनी मूर्ति को संभाले।
तभी दूर से आती हुयी दिखी वो। अब तो धड़कन शताब्दी की रफ़्तार पकड़ चुकी थी। लेकिन ज्यों ज्यों वो पास आने लगी। उसके मांग की सिंदूर और गले का मंगलसूत्र बिलकुल स्पष्ठ दिखने लगा.। धड़कन अब मंथर हो गयी थी। सिन्दूर का रंग चुभने लगा उसे, रंग और गाढ़ा हो चला था। मांग में फैला सिंदूर उसे अपने चारो ओर उड़ता हुआ दिखने लगा था। मन में छाये इस सिन्दूरी बवंडर में प्रेम कही खोने लगा था। खुद को सम्भाला उसने।गौर से देखने लगा उसकी सूरत को। अनजाना सा लगा वो चेहरा। आँखें बंद की मन आँगन में स्थापित मूर्ति अभी भी वैसी की वैसी ही थी अक्षत।चुप चाप उठ के चल पड़ा वो अपनी मूर्ति को संभाले।
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